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भारतीय ज्ञान परम्परा की आत्मा है शास्त्रार्थ: विजेंद्र गुप्ता

Shastrartha, The Relevance of Shastrarth in Contemporary Times, Vijender Gupta

नई दिल्ली:  भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (आईसीपीआर), शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, तथा भारत बोध केंद्र, इंडिया हैबिटेट सेंटर (आईएचसी), नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित ‘ वर्तमान समय में शास्त्रार्थ का अनुप्रयोग’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि शास्त्रार्थ भारतीय ज्ञान परम्परा की आत्मा है | सत्र के विशिष्ठ अतिथि संस्कृत भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष प्रो० रमेश कुमार पाण्डेय एवं अध्यक्षता भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के सदस्य सचिव प्रो. सच्चिदानंद मिश्र की।

सत्र को सम्बोधित करते हुए दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि हमारी सभ्यता में शास्त्रार्थ को अत्यंत ही महत्त्व दिया गया है क्योंकि यह सृजनात्मक विचारों को जन्म देती है | उन्होंने कहा कि आज के सूचना युग में सुनने की शक्ति निरंतर कम हुई है जो स्वस्थ समाज के लिए घातक है | सभा को सम्बोधित करते हुए उन्होंने आगे कहा कि सदन में की जाने वाली बहस आधुनिक शास्त्रार्थ का एक रूप है | मर्यादा के साथ निष्पक्ष रूप से तथ्यपरक संवाद से हम अनेकानेक समस्याओं का समाधान कर सकते हैं | तर्क एवं तथ्य पर आधारित बहस लोकतंत्र को मजबूत बनाने की क्षमता रखता है जिससे लोक निर्माण में मदद मिलती है | शास्त्रार्थ में पराजय भी एक विजय है क्योंकि इसमें दोनों पक्ष ज्ञान की विवेचना में सफल होते हैं |

बतौर विशिष्ट अतिथि संस्कृत भारती के अखिल भारतीय अध्यक्ष प्रो० रमेश कुमार पाण्डेय ने कहा कि शास्त्रार्थ हमेशा से एक कौतुहल का विषय रहा है | शास्त्रार्थ में स्वस्थ संवाद होता है न कि विवाद | शास्त्रार्थ का उद्देश्य विचार के उत्कृष्ट स्वरुप को प्रदान करना होता है | शास्त्रार्थ उतना ही आवश्यक है जितना कि शास्त्र | राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने शास्त्र को पढ़ने एवं समझने का अवसर प्रदान किया है | एक सूत्र दूसरे सूत्र का व्यापक है | बिना तर्क के शास्त्रार्थ नहीं किया जा सकता | वर्तमान दौर में तर्क की जगह कुतर्क ज्यादा देखने को मिलता है | ज्ञान प्राप्त करने के लिए शरणागत होना जरुरी है |

अतिथियों का स्वागत करते हुए आईसीपीआर के सदस्य सचिव प्रो. सच्चिदानंद मिश्र ने कहा कि इस आयोजन से शास्त्रार्थ की सार्थक परम्परा को एक नई दिशा मिलेगी, ज्ञान के भारतीयकरण में भी शास्त्रार्थ की भूमिका महत्वपूर्ण होगी | भारतीय समाज में संवाद का इतिहास अत्यंत पुराना है | लोकतंत्र में वाद एवं संवाद के लिए अवसर होना चाहिए | ज्ञान को आगे बढ़ाने में सामूहिक संवाद अत्यंत महत्वपूर्ण है | शास्त्रार्थ का आयाम बहुत ही लम्बा है, यह ज्ञान की एक विधा तक सीमित नहीं है | न्याय, व्याकरण, एवं साहित्य में शास्त्रार्थ की पद्धति देखने को मिलती है| उन्होंने कहा कि विश्व के किसी भी विवाद का समाधान संवाद है, शास्त्रार्थ है। अभी हाल ही में अमेरिका ईरान का विवाद भी संवाद के मंच पर समाधान हुआ।

संगोष्ठी संयोजक सिद्धेश्वर शुक्ल ने कहा कि हमारी संस्कृति में प्रश्न पूछने को सराहा जाता है | भारतीय समाज में प्राचीन काल से ही शास्त्रार्थ की स्वस्थ परम्परा रही है जिसका उल्लेख हमारे वैदिक ग्रंथों में मिलता है | हमारे उपनिषद एवं भारतीय ज्ञान परम्परा से जुड़े विभिन्न ग्रंथों में अनेक उदाहरण मिलते हैं | शास्त्रार्थ सत्य को उद्घाटित करने की क्षमता रखता है | डॉ० अमित यादव ने कहा कि लोकहित संवर्धन में शास्त्रार्थ का महत्वपूर्ण योगदान है| जड़ों की ओर लौटने को राष्ट्रीय शिक्षा नीति में महत्त्व दिया गया है और ‘ वर्तमान समय में शास्त्रार्थ का अनुप्रयोग’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी उसी को मूर्त रूप देने का एक प्रयास है | उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ० योगिता शर्मा ने एवं धन्यवाद ज्ञापन देवेन्द्र कुमार जाटव ने किया |

संगोष्ठी में विभिन्न विषयों के अन्तर्गत विभक्त तकनीकि सत्रों का संचालन किया गया। प्रथम तकनीकि सत्र में प्रो० बिश्नुपदा महापात्र, प्रो० मुरारी शरण शुक्ल, प्रो० महानंद झा, प्रो० संतोष कुमार शुक्ल एवं प्रो० ओम नाथ बिमली ने अपने विचार व्यक्त किए | सत्र की अध्यक्षता एवं विचार विमर्श की मध्यस्थता प्रो. सच्चिदानंद मिश्र ने की | द्वितीय तकनीकी सत्र में प्रो० प्रस्नान्सु, डॉ० नीरज कर्ण सिंह, अरुण कुमार शुक्ला, डॉ० क्षितिज कुमार सिंह ने अपने विचार प्रस्तुत किये | गोष्ठी में विभिन्न विश्वविद्यालयों से विद्वानों और शोधार्थियों ने सहभागिता किया

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