लंदन: विदेश में शिक्षा प्राप्त करने का बाजार हर वर्ष बढ़ रहा है, लेकिन छात्रों के निर्णय लेने का तरीका भी उतनी ही तेजी से बदल रहा है। वर्षों तक प्राथमिकता का क्रम स्पष्ट था। अमेरिका पहले स्थान पर रहता था, उसके बाद ऑस्ट्रेलिया और कनाडा आते थे, जबकि ब्रिटेन एक सम्मानित लेकिन अक्सर अनदेखा विकल्प माना जाता था। अब यह स्थिति तेजी से बदल रही है।
अमेरिका में जारी वीज़ा संकट और ऑस्ट्रेलिया की सख्त नीतियों के कारण बड़ी संख्या में भारतीय छात्र अपने विकल्पों पर दोबारा विचार कर रहे हैं। और अधिकतर मामलों में उनकी यह नई पसंद ब्रिटेन बन रहा है। हायर एजुकेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट के अनुसार, वर्ष 2025 की पहली तिमाही में ब्रिटेन का अध्ययन वीज़ा प्राप्त करने वाले भारतीय छात्रों की संख्या 19,300 रही, जो 2024 की पहली तिमाही की तुलना में 31 प्रतिशत अधिक है। वहीं, वीज़ा स्वीकृति दर बढ़कर 96 प्रतिशत हो गई। ब्रिटेन के गृह मंत्रालय के अनुसार, जून 2025 को समाप्त वर्ष में भारतीय छात्रों को 98,014 अध्ययन वीज़ा प्रदान किए गए, जो सभी प्रायोजित अध्ययन वीज़ाओं का 24 प्रतिशत हिस्सा था।
प्रोडिजी फाइनेंस की ग्लोबल चीफ बिजनेस ऑफिसर सोनल कपूर ने कहा, “सच्चाई यह है कि कई भारतीय छात्रों के लिए ब्रिटेन कभी भी बैकअप विकल्प नहीं था। यह उनकी पहली पसंद था, लेकिन वे अक्सर यह सोचकर पीछे हट जाते थे कि वहां प्रवेश अधिक प्रतिस्पर्धी या कठिन होगा। जब अन्य देशों में वीज़ा संबंधी निराशा मिली, तब छात्रों ने महसूस किया कि ब्रिटेन हमेशा से उनके लिए उपलब्ध था, जहां मजबूत वीज़ा स्वीकृति दर, विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थान और वैश्विक प्रतिष्ठा मौजूद है।”
उन्होंने आगे कहा, “हालांकि STEM कार्यक्रमों के लिए अमेरिका अब भी प्रमुख गंतव्य बना हुआ है, लेकिन ब्रिटेन दुनिया की सबसे विविध शैक्षणिक व्यवस्थाओं में से एक है। कानून, व्यवसाय, इंजीनियरिंग और कला जैसे क्षेत्रों में उपलब्ध डिग्रियों की गुणवत्ता और विविधता का मुकाबला करना कठिन है। इसलिए जब छात्र इंतजार नहीं करना चाहते या अन्यत्र जोखिम नहीं उठाना चाहते, तो वे ब्रिटेन का रुख करते हैं।”
उन्होंने बताया कि अनिश्चितता के इस दौर में छात्रों के व्यवहार में एक नया रुझान देखने को मिल रहा है। छात्र एक ही समय में कई देशों के कई ऑफर अपने पास रख रहे हैं और अंतिम क्षण तक अपने विकल्प खुले रख रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, किसी छात्र के पास ब्रिटेन के विश्वविद्यालय में पुष्टि की गई सीट, ऑस्ट्रेलिया के संस्थान से सशर्त प्रवेश प्रस्ताव और जर्मनी में लंबित आवेदन हो सकता है। ऐसे छात्र तीनों स्थानों पर जमा राशि भी जमा कर रहे हैं और यह देखने का इंतजार कर रहे हैं कि किस देश का वीज़ा पहले मिलता है। उनके अनुसार यह असमंजस नहीं बल्कि एक रणनीति है। हालांकि इससे कुछ छात्रों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है, लेकिन प्रतिस्पर्धी माहौल में अंतरराष्ट्रीय डिग्री सुनिश्चित करने का यह एक व्यावहारिक तरीका माना जा रहा है।
सोनल कपूर ने छात्रों को सलाह देते हुए कहा, “हम हमेशा छात्रों से कहते हैं कि जल्दबाजी में निर्णय न लें। विशेषज्ञों से सलाह लें, अपने सभी विकल्पों को समझें और पहले से योजना बनाएं। नोवाग्रैड जैसे प्लेटफॉर्म विदेश में अध्ययन की योजना बनाने में निःशुल्क मदद कर सकते हैं। वहीं वित्तीय चिंताओं से जूझ रहे छात्रों के लिए प्रोडिजी फाइनेंस इसी उद्देश्य से कार्य करता है, ताकि वित्तपोषण की कमी उनके अवसरों में बाधा न बने।”
उन्होंने कहा कि जर्मनी अब केवल एक वैकल्पिक गंतव्य नहीं रह गया है, बल्कि बड़ी संख्या में छात्रों की पसंद बनता जा रहा है। DAAD की ‘विसेनशाफ्ट वेल्टऑफेन 2025’ रिपोर्ट के अनुसार, शीतकालीन सत्र 2024-25 में जर्मनी के विश्वविद्यालयों में 4.02 लाख अंतरराष्ट्रीय छात्र नामांकित थे, जो पिछले वर्ष की तुलना में 6 प्रतिशत अधिक है। भारत लगभग 59,000 छात्रों के साथ सबसे बड़ा स्रोत देश रहा, जहां एक वर्ष में 20 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। निजी संस्थानों में अपेक्षाकृत किफायती शुल्क, अनुकूल वीज़ा प्रक्रिया और अध्ययन पूरा करने के बाद 18 माह का जॉब सीकर वीज़ा छात्रों को आकर्षित कर रहा है। इसके अलावा, जर्मन संघीय विदेश कार्यालय के अनुसार, देश ने सितंबर 2025 में निःशुल्क वीज़ा व्यवस्था शुरू की, जिसके तहत भारतीय छात्र अल्पकालिक शैक्षणिक यात्राएं बिना वीज़ा शुल्क के कर सकते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 का छात्र वर्ग वर्ष 2019 के छात्रों से अलग है। वे अधिक शोध कर रहे हैं, पहले से योजना बना रहे हैं और किसी एक परिणाम पर निर्भर रहने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसे में वे देश छात्रों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं जो विश्वसनीयता, प्रतिष्ठा और स्नातक होने के बाद स्पष्ट अवसर प्रदान करते हैं। वर्तमान में इस सूची में ब्रिटेन अग्रणी है और जर्मनी भी तेजी से अपनी जगह बना रहा है।







