New Delhi (भगवत प्रसाद शर्मा): पुरुषोत्तम मास में आनेवाली बृज चौरासी कोस की “पावन बृज परिक्रमा के महत्व” के बारे प्रकाश डालते हुए ग्राम खाम्बी (खम्बवन) के निवासी पंडित भगवत प्रसाद शर्मा बृजवासी ने विस्तार से बताया कि अब हमारे ब्रजमंडल में पुरुषोत्तम मास के अवसर पर आयोजित चौरासी कोस की परिक्रमा का पावन पर्व अपने समापन की ओर अग्रसर है। लगभग एक माह तक चलने वाली यह दिव्य यात्रा 15 जून को पूर्णाहुति के साथ संपन्न होगी। श्रद्धा, भक्ति, सेवा और समर्पण से ओतप्रोत इस परिक्रमा में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर ब्रजभूमि की आध्यात्मिक चेतना का अनुभव किया।
लगभग 252 किलोमीटर में विस्तृत ब्रजमंडल की इस परिक्रमा में मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन, बरसाना, नन्दगाँव, गोकुल, राधाकुण्ड, श्यामकुण्ड, कामवन तथा अन्य प्रमुख लीलास्थलों का दर्शन एवं भ्रमण कराया गया। मान्यता है कि यह परिक्रमा केवल तीर्थयात्रा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, आत्मबोध और परमात्मा से प्रेमपूर्ण संबंध स्थापित करने का माध्यम है।
पूरे परिक्रमा काल में ब्रजभूमि भक्तिमय वातावरण से सराबोर रही। प्रातःकालीन मंगला आरती, अखंड संकीर्तन, भागवत कथा, संत प्रवचन और भजन-कीर्तन के माध्यम से श्रद्धालुओं ने दिव्य आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त की। विभिन्न स्थानों पर ब्रजवासियों एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा जलसेवा, भंडारे, चिकित्सा सहायता और विश्राम की व्यवस्थाएँ की गईं, जिसने ब्रज की सेवा-संस्कृति को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।
परिक्रमा का विशेष आकर्षण दिव्यांग श्रद्धालुओं की प्रेरणादायी सहभागिता रही। शारीरिक चुनौतियों के बावजूद उनकी अटूट आस्था और दृढ़ संकल्प ने सभी को भावविभोर कर दिया। यह दृश्य इस सत्य का प्रमाण बना कि ब्रज तक पहुँचने का मार्ग केवल पैरों से नहीं, बल्कि श्रद्धा और समर्पण से तय होता है।
आगे उन्होंने कहा कि ब्रज संस्कृति में सेवा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। यहाँ श्रद्धालुओं को अतिथि नहीं, बल्कि ठाकुरजी का स्वरूप मानकर सेवा की जाती है। यही आत्मीयता और प्रेम ब्रज को विश्व के अन्य तीर्थस्थलों से विशिष्ट बनाता है।
चौरासी कोस परिक्रमा का आध्यात्मिक संदेश प्रेम, भक्ति और सेवा के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाने का है। परिक्रमा पूर्ण होने पर श्रद्धालु अपने साथ केवल स्मृतियाँ ही नहीं, बल्कि ब्रजरज की पवित्रता, राधा-कृष्ण के प्रेम और आध्यात्मिक संतोष का अमूल्य अनुभव भी लेकर लौटते हैं।
ब्रजभूमि, संत-महात्माओं, ब्रजवासियों तथा लाखों श्रद्धालुओं की निष्कलुष भक्ति को नमन करते हुए यह परिक्रमा एक बार पुनः सिद्ध करती है कि प्रेम, श्रद्धा और भक्ति आज भी मानव जीवन की सबसे बड़ी शक्ति हैं।







