नई दिल्ली: FICCI-IBA बैंकर्स सर्वे के 22वें दौर में जुलाई से दिसंबर 2026 की अवधि के लिए बैंकिंग क्षेत्र की संभावनाओं को लेकर उद्योग जगत की राय सामने आई है। इस सर्वेक्षण में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, निजी क्षेत्र के बैंकों और विदेशी बैंकों सहित कुल 22 बैंकों ने भाग लिया। ये बैंक सामूहिक रूप से देश की कुल बैंकिंग परिसंपत्तियों के तीन-चौथाई से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।
यह सर्वेक्षण भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत स्थिति की पृष्ठभूमि में किया गया। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर बढ़कर 7.8% हो गई, जिसे विनिर्माण और सेवा गतिविधियों में मजबूत प्रदर्शन का समर्थन मिला। इस दौरान वास्तविक सकल मूल्य वर्धन (GVA) में 8.2% की वृद्धि दर्ज की गई। निवेश गतिविधियों में भी मजबूती आई और सकल स्थिर पूंजी निर्माण में 11.9% की वृद्धि हुई। वहीं, निजी अंतिम उपभोग व्यय में 7.1% की वृद्धि दर्ज की गई।
इसके साथ ही, अगस्त 2026 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई दर 4.82% रही, जबकि खाद्य महंगाई दर बढ़कर 5.95% हो गई, जो पहले के स्तर से अधिक है। भारतीय बैंकिंग क्षेत्र बेहतर परिसंपत्ति गुणवत्ता, मजबूत पूंजी आधार, खुदरा एवं एसएमई ऋण में निरंतर वृद्धि और निजी क्षेत्र के पूंजीगत व्यय में व्यापक सुधार के शुरुआती संकेतों के सहारे अपनी मजबूती बनाए हुए है।
घरेलू आर्थिक वृद्धि की मजबूत गति, महंगाई के बदलते रुझानों तथा बढ़ती भू-राजनीतिक और वैश्विक व्यापार संबंधी अनिश्चितताओं के बीच यह सर्वेक्षण 2026 की दूसरी छमाही में ऋण वृद्धि की संभावनाओं, विभिन्न क्षेत्रों में ऋण की मांग, उभरते जोखिमों और बैंकिंग क्षेत्र की रणनीतिक प्राथमिकताओं पर जानकारी प्रदान करता है।
सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि बैंकिंग क्षेत्र में ऋण वृद्धि को लेकर मजबूत सकारात्मक दृष्टिकोण बना हुआ है। खुदरा, एसएमई, औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों में मांग की मजबूती से इसे समर्थन मिल रहा है, हालांकि बैंक वित्तपोषण और व्यापक आर्थिक चुनौतियों से भी जूझ रहे हैं।
लगभग तीन-चौथाई उत्तरदाताओं को उम्मीद है कि अगले छह महीनों में गैर-खाद्य ऋण (नॉन-फूड क्रेडिट) में सालाना आधार पर मध्य-किशोर स्तर (15% के आसपास) या उससे अधिक की वृद्धि होगी। लगभग सभी उत्तरदाताओं को कम से कम दोहरे अंकों में वृद्धि की उम्मीद है। निजी क्षेत्र के बैंक सबसे अधिक आशावादी हैं। इनमें लगभग 90% उत्तरदाताओं को मध्य-किशोर स्तर या उससे अधिक की वृद्धि की उम्मीद है। इसके बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक हैं, जहां लगभग तीन-चौथाई उत्तरदाताओं की यही राय है। विदेशी बैंकों का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत सतर्क है। उनके सभी उत्तरदाताओं को कम दोहरे अंकों की दर से वृद्धि की उम्मीद है, जो चुनिंदा क्षेत्रों में उनकी केंद्रित ऋण हिस्सेदारी के अनुरूप है।
खुदरा और एसएमई ऋण को ऋण वृद्धि का सबसे प्रमुख आधार माना गया है। पांच में से चार से अधिक उत्तरदाताओं को खुदरा ऋण और एसएमई ऋण, दोनों में सालाना आधार पर मजबूत दोहरे अंकों की वृद्धि की उम्मीद है। एसएमई ऋण में लगभग सभी उत्तरदाताओं को दोहरे अंकों की वृद्धि की संभावना दिख रही है।
औद्योगिक क्षेत्र को दिए जाने वाले ऋण में भी मजबूत वृद्धि जारी रहने की उम्मीद है। लगभग सभी उत्तरदाताओं ने इसमें अच्छी वृद्धि का अनुमान लगाया है। वहीं, तीन-चौथाई से अधिक उत्तरदाताओं को सेवा क्षेत्र के ऋण में मजबूत दोहरे अंकों की वृद्धि की उम्मीद है। इनमें से आधे उत्तरदाताओं ने मध्य-किशोर स्तर या उससे अधिक की वृद्धि का अनुमान लगाया है। कृषि और संबद्ध गतिविधियों के लिए ऋण की संभावनाएं भी सकारात्मक हैं, हालांकि इस क्षेत्र में उत्तरदाताओं की राय में कुछ अंतर है। लगभग तीन-चौथाई उत्तरदाताओं को इस क्षेत्र में दोहरे अंकों की वृद्धि की उम्मीद है।
औद्योगिक क्षेत्र में सावधि ऋण (टर्म लोन) की मांग मुख्य रूप से बुनियादी ढांचा क्षेत्र से आने की उम्मीद है। इसके बाद इंजीनियरिंग उत्पाद, ऑटो एवं ऑटो कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा धातु, लोहा एवं इस्पात क्षेत्रों का स्थान है।
इसके विपरीत, कार्यशील पूंजी ऋण (वर्किंग कैपिटल) की मांग मुख्य रूप से व्यापार चक्र और परिचालन संबंधी वित्तपोषण आवश्यकताओं से प्रेरित होने की उम्मीद है। इसमें ऑटो एवं ऑटो कंपोनेंट्स तथा पेट्रोलियम, कोयला एवं ईंधन उत्पाद क्षेत्र प्रमुख होंगे। इसके बाद खाद्य प्रसंस्करण, रसायन तथा धातु, लोहा एवं इस्पात क्षेत्रों का स्थान है।
सेवा क्षेत्र में सावधि ऋण की मांग मुख्य रूप से गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs), पर्यटन, होटल एवं रेस्तरां तथा वाणिज्यिक रियल एस्टेट से आने की उम्मीद है। वहीं, सेवा क्षेत्र में कार्यशील पूंजी ऋण की मांग का सबसे प्रमुख आधार थोक एवं खुदरा व्यापार होगा। इसके बाद पर्यटन, होटल एवं रेस्तरां तथा परिवहन संचालकों का स्थान है।
सर्वेक्षण में ऋण वृद्धि की संभावनाओं को प्रभावित करने वाली संरचनात्मक बाधाओं की ओर भी संकेत किया गया है। ऋण की मांग की तुलना में जमा वृद्धि की धीमी गति को स्वस्थ ऋण विस्तार बनाए रखने की सबसे बड़ी बाधा बताया गया है। लगभग दो-तिहाई उत्तरदाताओं ने इस चुनौती का उल्लेख किया। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बड़े बहुमत ने भी इसे प्रमुख बाधा माना। यह स्थिति बैंकों के लिए जमा जुटाने और अपने जमा आधार को मजबूत करने के बढ़ते महत्व को रेखांकित करती है।
निजी और विदेशी बैंकों के बीच आर्थिक एवं भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं भी प्रमुख चिंता का विषय हैं। विदेशी मुद्रा जमा जुटाने को बढ़ावा देने के हालिया उपायों, जिनमें FCNR(B) जमाओं के लिए दी गई लचीलापन संबंधी सुविधा भी शामिल है, से बैंकों को अपना वित्तपोषण आधार मजबूत करने और तरलता संबंधी दबावों को प्रबंधित करने में अतिरिक्त सहायता मिलने की उम्मीद है। सर्वेक्षण के उत्तर उस समय की परिस्थितियों को दर्शाते हैं, जब इसे किया गया था।
भू-राजनीतिक जोखिमों और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधानों को निजी क्षेत्र के पूंजीगत व्यय में व्यापक सुधार की राह में सबसे बड़ी बाधा माना गया है। लगभग तीन-पांचवें उत्तरदाताओं ने इसका उल्लेख किया। इसके बाद वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और अपेक्षाकृत कम महत्व के साथ कमजोर मांग की संभावनाओं को प्रमुख बाधाओं के रूप में देखा गया।
यह संकेत देता है कि निजी क्षेत्र में पूंजीगत व्यय के निरंतर चक्र को गति देने के लिए केवल पूंजी की लागत ही नहीं, बल्कि निवेशकों का विश्वास और परिचालन माहौल को लेकर स्पष्टता भी महत्वपूर्ण है।
रणनीतिक दृष्टिकोण से वित्त वर्ष 2026-27 में बैंकों के प्रबंधन का सबसे अधिक ध्यान जमा जुटाने और जमा आधार को मजबूत करने पर रहने की उम्मीद है। इसके बाद कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एवं डेटा आधारित बैंकिंग बदलाव तथा तीसरे स्थान पर साइबर सुरक्षा और परिचालन संबंधी मजबूती को प्राथमिकता दी जाएगी। खुदरा और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) ऋण वृद्धि भी एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता है, हालांकि इसका स्थान तुलनात्मक रूप से नीचे है।
यह रुझान दर्शाता है कि बैंकिंग क्षेत्र बैलेंस शीट की बुनियादी मजबूती बनाए रखने के साथ-साथ प्रौद्योगिकी आधारित बदलावों को तेज करने पर भी ध्यान दे रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक AI आधारित बदलाव को पहली प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि निजी क्षेत्र के बैंक जमा जुटाने को सबसे अधिक महत्व दे रहे हैं।
नीतिगत मोर्चे पर, वित्त वर्ष 2026-27 में ऋण वृद्धि पर सबसे अधिक सकारात्मक प्रभाव डालने वाली सरकारी पहल के रूप में ECLGS 5.0 को देखा गया है। यह गारंटी आधारित ऋण सहायता में विश्वास को दर्शाता है। इसके बाद बुनियादी ढांचा एवं सार्वजनिक पूंजीगत व्यय कार्यक्रमों और उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं का स्थान है। डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे तथा नवीकरणीय ऊर्जा एवं हरित बदलाव से जुड़ी पहलों को भी ऋण वृद्धि में सहायक माना गया है।
कुल मिलाकर, सर्वेक्षण से पता चलता है कि बैंकिंग क्षेत्र खुदरा, एसएमई, औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों में लगातार दोहरे अंकों की ऋण वृद्धि को लेकर आशावादी बना हुआ है। हालांकि, निष्कर्ष यह भी बताते हैं कि बैंकिंग क्षेत्र की चुनौतियां अब मौद्रिक प्रकृति की तुलना में अधिक संरचनात्मक होती जा रही हैं। जमा जुटाने में कठिनाइयां और भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं प्रमुख चुनौतियों के रूप में उभरी हैं, जिनका प्रबंधन करते हुए बैंक वित्त वर्ष 2026-27 में निरंतर विस्तार की तैयारी कर रहे हैं।







