नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में व्यवधान भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा जोखिम पैदा कर रहे हैं, क्योंकि कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से महंगाई, रुपये और चालू खाते पर दबाव बढ़ने की आशंका है। यह बात यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में कही गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि “तेल की ऊंची कीमतें महंगाई के जोखिम को बढ़ाए रखती हैं, केंद्रीय बैंक द्वारा दरों में ढील में देरी करती हैं, चालू खातों पर दबाव डालती हैं, वित्तीय स्थितियों को सख्त करती हैं और जोखिम वाली परिसंपत्तियों पर असर डालती हैं, खासकर ऊर्जा आयात करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में।” रिपोर्ट में कहा गया है कि यह भारत जैसे देशों की संवेदनशीलता को रेखांकित करता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत, जो अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 85 प्रतिशत आयात करता है, उसके लिए इसका असर पहले से ही दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज़ से तेल आपूर्ति में व्यवधान के कारण कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई है, जो अर्थव्यवस्था पर एक स्पष्ट “ऊर्जा कर” के रूप में दिख रही है।
“फ्रॉम होर्मुज़ टू द रुपी: वॉर, ऑयल एंड द ग्लोबल रीप्राइसिंग ऑफ रिस्क” शीर्षक वाली अपनी रिपोर्ट में यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने कहा कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य “अब भी व्यावहारिक रूप से बंद” है और ब्रेंट कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार कर रहा है, ऐसे में यह स्थिति वैश्विक और घरेलू व्यापक आर्थिक परिस्थितियों तथा बाजारों के लिए अनुकूल नहीं है।
रिपोर्ट में कहा गया है, “ईरान-इजरायल संघर्ष बढ़ने से होर्मुज़ जलडमरूमध्य के जरिए आपूर्ति बाधित हुई, जिससे ब्रेंट कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया। इसका असर एक स्पष्ट ‘ऊर्जा कर’ के रूप में दिखा, रुपये में गिरावट आकर यह 95 के करीब रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया और चालू खाते के घाटे तथा आयातित महंगाई की चिंताओं से शेयर बाजार में गिरावट आई।”
रिपोर्ट के अनुसार, इन वैश्विक प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भारतीय रुपया दबाव में बना हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मुद्रा में “मामूली कमजोरी का रुझान” दिखा, क्योंकि वैश्विक स्तर पर डॉलर की मजबूती, बीच-बीच में पूंजी निकासी और बढ़ी हुई भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं ने घरेलू अर्थव्यवस्था की अपेक्षाकृत मजबूत बुनियादी स्थिति को पीछे छोड़ दिया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने बाजारों को स्थिर करने के लिए हस्तक्षेप किया है। रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय बैंक ने अपनी नीतिगत स्थिति बरकरार रखते हुए विदेशी मुद्रा जोखिम सीमा को सख्त करने और तरलता समर्थन सहित कई कदम उठाए हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, “आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखा, साथ ही तटस्थ रुख को दोहराया।” इसमें कहा गया है कि अत्यधिक उतार-चढ़ाव की स्थिति में केंद्रीय बैंक कार्रवाई के लिए तैयार है।
बाहरी मोर्चे पर भारत के व्यापार संतुलन ने मजबूती के संकेत दिए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्च 2026 में वस्तु व्यापार घाटा घटकर 20.7 अरब डॉलर रह गया, जिसे सोना और ऊर्जा आयात में कमी से समर्थन मिला।
हालांकि, जोखिम अब भी ऊंचे बने हुए हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि व्यवधान जारी रहता है, तो “ब्रेंट 100–110 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में बना रह सकता है, जिससे ईंधन कीमतों का असर बढ़ने और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महंगाई 4 प्रतिशत से ऊपर जाने का जोखिम बढ़ेगा।”
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि भारत के व्यापक आर्थिक संकेतक तेल कीमतों के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। इसमें कहा गया है कि “कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी” चालू खाते के घाटे को काफी बढ़ा सकती है और महंगाई के दबाव को और तेज कर सकती है।







