स्टॉकहोम/नैरोबी: पेरिस समझौते के तहत निर्धारित 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की सीमा को पार करने से पृथ्वी की पिघलती बर्फ की चादरों, पर्माफ्रॉस्ट, ग्लेशियरों, समुद्री बर्फ और ध्रुवीय महासागरों पर व्यापक और कई मामलों में अपरिवर्तनीय प्रभाव पड़ेंगे। हालांकि, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कटौती और उसके बाद वायुमंडल से कार्बन हटाने की प्रक्रिया को बड़े स्तर पर लागू करके तापमान वृद्धि की इस सीमा को पार करने की अवधि और स्तर को न्यूनतम रखा जाए, तो इन नुकसानों को सीमित किया जा सकता है।
वैश्विक स्तर पर बर्फ की स्थिति अस्थायी रूप से तापमान सीमा पार होने पर भी गंभीर प्रतिक्रिया देती है। जीवाश्म ईंधन से तेजी से दूरी बनाना इस बात का अंतर तय करेगा कि नुकसान को किस हद तक नियंत्रित किया जा सकता है या फिर ग्रह नेपाल में अगस्त में आई आपदा जैसी लगातार प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में आ जाएगा।
ये प्रमुख निष्कर्ष आज संयुक्त रूप से जारी की गई दो रिपोर्टों में सामने आए हैं। इनमें ‘ओवरशूट एंड द क्रायोस्फीयर: अवर्टिंग ग्लोबल मेल्टडाउन’ और ‘स्टेट ऑफ द क्रायोस्फीयर 2026: द कॉस्ट ऑफ ओवरशूट’ शामिल हैं।
इन रिपोर्टों में तापमान वृद्धि की निर्धारित सीमा पार होने के कारण बर्फ के नुकसान के वैश्विक प्रभावों का आकलन किया गया है। साथ ही यह भी बताया गया है कि कौन-से नुकसान अब अपरिहार्य हो चुके हैं और जलवायु संबंधी त्वरित कार्रवाई से किस तरह इन नुकसानों के सबसे गंभीर प्रभावों को रोका या धीमा किया जा सकता है। तुर्किये में होने वाले COP31 से पहले ये रिपोर्टें महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं।
‘ओवरशूट एंड द क्रायोस्फीयर’ के समन्वयक प्रमुख लेखक डॉ. जेम्स किर्कहैम ने 80 से अधिक ध्रुवीय और पर्वतीय वैज्ञानिकों की टीम के साथ कहा, “1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वृद्धि के कोई अच्छे परिणाम नहीं हैं। दुनिया के ध्रुवीय और पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ के नुकसान से होने वाले वैश्विक प्रभावों और क्षति को सीमित करने के लिए तापमान वृद्धि की निर्धारित सीमा को पार करने की स्थिति को न्यूनतम रखना होगा। जोखिम कम करने के लिए तापमान को जल्द से जल्द फिर से 1.5 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे लाना आवश्यक है।”
इंटरनेशनल क्रायोस्फीयर क्लाइमेट इनिशिएटिव (ICCI) द्वारा संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के समन्वय में तैयार की गई ‘ओवरशूट एंड द क्रायोस्फीयर’ रिपोर्ट, UNEP की हाल ही में जारी ‘लिमिटिंग ओवरशूट रिपोर्ट’ की विषयगत पूरक रिपोर्ट है। यह संयुक्त राष्ट्र की किसी एजेंसी की ओर से अपनी तरह की पहली रिपोर्ट है। इसी तरह विशेषज्ञों की समीक्षा से गुजरने वाली वार्षिक रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ द क्रायोस्फीयर 2026’ इस वर्ष ‘द कॉस्ट ऑफ ओवरशूट’ शीर्षक से जारी की गई है, जो UNEP-ICCI की रिपोर्ट पर आधारित है।
ICCI के मुख्य वैज्ञानिक किर्कहैम ने कहा, “तापमान में डिग्री का हर अतिरिक्त अंश और तापमान सीमा से ऊपर बिताया गया हर साल और अधिक विनाशकारी प्रभाव लेकर आएगा।”
दोनों रिपोर्टों में तापमान को निर्धारित सीमा से ऊपर जाने के बाद फिर से कम करने के लिए व्यावहारिक समाधान भी बताए गए हैं। नवीकरणीय ऊर्जा और बैटरी तकनीकों का तेजी से विस्तार हो रहा है, कोयले और तेल पर निर्भरता घट रही है तथा जलवायु नीतियों के कारण कई क्षेत्रों में उत्सर्जन में कमी आई है।
रिपोर्टों के अनुसार, उत्सर्जन में हर साल कम से कम 5 प्रतिशत की कटौती करने के लिए सफल नीतियों को बड़े स्तर पर लागू करने की आवश्यकता है। इसकी शुरुआत तत्काल होनी चाहिए, ताकि इस सदी के मध्य तक ग्रीनहाउस गैसों का शुद्ध शून्य उत्सर्जन हासिल किया जा सके।
रिपोर्टों में इस बात पर जोर दिया गया है कि जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने में कोई देरी नहीं होनी चाहिए। इससे भविष्य में वायुमंडल से कार्बन हटाकर तापमान को कम करने की संभावना बनी रहेगी।
ऐसा करने से वैश्विक स्तर पर बर्फ के नुकसान से प्रभावित होने वाली भावी पीढ़ियों को कई महत्वपूर्ण लाभ मिल सकते हैं:
– समुद्र के जलस्तर में वृद्धि की रफ्तार धीमी करना: समुद्र के जलस्तर में कई मीटर की वृद्धि आने वाली कई शताब्दियों के लिए पहले ही तय हो चुकी है, क्योंकि ध्रुवीय बर्फ की चादरें लंबे समय से पीछे हट रही हैं। हालांकि, यह वृद्धि कितनी तेजी से होगी, इसका आज जलवायु परिवर्तन के अग्रिम मोर्चे पर स्थित तटीय समुदायों के लिए बहुत महत्व है। समुद्र के जलस्तर में वृद्धि की रफ्तार को अनुकूलन योग्य स्तर तक धीमा किया जा सकता है।
– ग्लेशियरों, बर्फ की परतों और समुद्री बर्फ के नुकसान को रोकने की संभावना: तापमान को फिर से 1.5 डिग्री सेल्सियस या इससे नीचे लाने से आने वाले दशकों से लेकर शताब्दियों के भीतर कुछ समुद्री बर्फ और ग्लेशियरों का दोबारा विस्तार शुरू हो सकता है। साथ ही बर्फ की परतों का स्वस्थ स्तर भी फिर से स्थापित हो सकता है।
– पर्माफ्रॉस्ट के अस्थिर होने से होने वाले नुकसान को सीमित करना: इससे नेपाल में देखी गई दुखद घटनाओं जैसी आपदाओं का खतरा कम किया जा सकता है। पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से कार्बन भी उत्सर्जित होता है। इससे जलवायु परिवर्तन का ऐसा चक्र बनता है, जिसके कारण भविष्य में वायुमंडल से और अधिक कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) हटाने की आवश्यकता पड़ेगी।
वर्तमान तापमान वृद्धि का स्तर भी आर्कटिक, अंटार्कटिका, पर्वतीय ग्लेशियरों और ध्रुवीय महासागरों के लिए पहले से ही असुरक्षित है। ‘स्टेट ऑफ द क्रायोस्फीयर 2026’ रिपोर्ट में पिछले एक वर्ष के नए वैज्ञानिक अध्ययनों और अवलोकनों का उल्लेख किया गया है। इनमें स्विट्जरलैंड में पिछले पांच वर्षों के दौरान ग्लेशियरों की 20 प्रतिशत बर्फ का नुकसान भी शामिल है।
इसके अन्य प्रभावों में बर्फ के तेजी से पिघलने के कारण समुद्र के जलस्तर में तेजी से वृद्धि, ग्लेशियरों के गायब होने और बर्फ की कमी की स्थिति फैलने से पानी की कमी तथा पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक खतरों का बढ़ना शामिल है।
हालांकि, तापमान को फिर से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक लाने से बर्फ के नुकसान की रफ्तार धीमी होगी, लेकिन आने वाली शताब्दियों में पृथ्वी की बर्फ के लिए वास्तव में सुरक्षित तापमान सीमा अब लगभग 1.0 डिग्री सेल्सियस या इससे भी कम मानी जा रही है।
COP31 में शामिल होने वाले नेपाल के युवा ग्लेशियर शोधकर्ता गुंजन सिलवाल ने कहा, “तापमान वृद्धि की निर्धारित सीमा पार होने का संकट हमारे सामने अभी मौजूद है। अगले कुछ वर्षों में लिए जाने वाले फैसले आज के युवाओं और आने वाली पीढ़ियों के लिए नुकसान का स्तर तय करेंगे। नेपाल की त्रासदी तो केवल इसकी एक झलक है।”
1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे तापमान लाने के लिए जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करते हुए उत्सर्जन में महत्वाकांक्षी और तेजी से कटौती करनी होगी। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के शब्दों में इसे “महत्वाकांक्षा की सीमा से भी आगे जाना” कहा जा सकता है।
इसके साथ ही मीथेन और ब्लैक कार्बन के उत्सर्जन में भी भारी कटौती आवश्यक है। इससे विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों में आपदा से निपटने की क्षमता, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा को तत्काल लाभ मिलेगा। शुद्ध शून्य उत्सर्जन हासिल करने के बाद तापमान को कम करने के लिए वायुमंडल से कार्बन हटाने की टिकाऊ, दीर्घकालिक और बड़े स्तर पर लागू की जा सकने वाली तकनीकों के अनुसंधान और निवेश में तेजी लानी होगी।
हालांकि, कुछ नुकसान को रोकना अब संभव नहीं है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूल ढलना प्राथमिकता होनी चाहिए। तापमान वृद्धि की निर्धारित सीमा पार होने और वैश्विक स्तर पर बर्फ के नुकसान से पैदा होने वाली चुनौतियों से निपटने, आपदाओं के प्रति लचीलापन बढ़ाने तथा नुकसान एवं क्षति की भरपाई के लिए अधिक प्रयास और वित्तीय सहायता की तत्काल आवश्यकता है।
ICCI की निदेशक पैम पियर्सन ने कहा, “जब आप हाईवे पर अपना निकास मार्ग चूक जाते हैं, तो आप अपने वास्तविक गंतव्य तक पहुंचने की योजना नहीं छोड़ते, बल्कि वापस लौटने का पहला अवसर तलाशते हैं। पूरी रफ्तार से आगे बढ़ते रहने से स्थिति और खराब होती है। 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे वापस लौटने का रास्ता मुश्किल हो सकता है, लेकिन विज्ञान और अर्थशास्त्र दोनों ही बेहतर भविष्य का मार्ग दिखाते हैं।”







