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समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी समझ आनी चाहिए कानूनी भाषा: डॉ. मनोज कुमार

नई दिल्ली: Society of Indian Law Firms (SILF), Sharda School of Law, शारदा यूनिवर्सिटी और लॉ टीचर्स इंडिया के सहयोग से “From Academia to Practice: Understanding the Law Firm Ecosystem in India” विषय पर ऑनलाइन फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम का उद्घाटन किया गया। यह अपनी तरह की पहली पहल है, जिसका उद्देश्य कानूनी शिक्षा जगत और कानूनी पेशे के बीच मजबूत तालमेल स्थापित करना है।

कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में कानून एवं न्याय मंत्रालय के विधायी विभाग के अतिरिक्त सचिव डॉ. मनोज कुमार तथा SILF के अध्यक्ष, CII नेशनल कमेटी ऑन लीगल सर्विसेज के चेयरमैन और इंडो-डेनिश बिजनेस काउंसिल के अध्यक्ष डॉ. ललित भसीन मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम की थीम “Legal Education Vs. Legal Practice: Bridging the Gap” रही।

प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए डॉ. मनोज कुमार ने कहा, “कानूनी शिक्षा और कानूनी प्रैक्टिस को एक-दूसरे के विरोधी क्षेत्र के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इन्हें सीखने, प्रयोग, आत्ममंथन और पेशेवर विकास की एक निरंतर एवं परस्पर जुड़ी प्रक्रिया के रूप में समझा जाना चाहिए। आज कानूनी शिक्षा के सामने चुनौती केवल कानून पढ़ाने की नहीं, बल्कि छात्रों को यह समझाने की है कि कानून व्यवहारिक जीवन में वास्तव में कैसे काम करता है।”

उन्होंने कहा कि तकनीक, नियमन और बाजार की बदलती जरूरतों के इस दौर में लॉ स्कूलों को केवल सैद्धांतिक पढ़ाई तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ऐसे “प्रैक्टिस-रेडी” वकील तैयार करने चाहिए जो व्यावहारिक अनुभव, लीगल-टेक की समझ, व्यावसायिक ज्ञान, नैतिक आधार, संवाद कौशल, बातचीत की क्षमता और सरल भाषा में ड्राफ्टिंग जैसी क्षमताओं से लैस हों।

डॉ. कुमार ने कहा, “आज कानूनी पेशे में केवल शैक्षणिक उत्कृष्टता ही नहीं, बल्कि विश्वसनीयता, स्पष्टता, संतुलित निर्णय क्षमता और व्यावहारिक दक्षता को भी समान महत्व दिया जा रहा है।”

अकादमिक जगत और कानूनी पेशे के बीच गहरे सहयोग की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा, “भारत का कानूनी इकोसिस्टम तेजी से विविध, विशेषज्ञतापूर्ण और तकनीक-आधारित होता जा रहा है। ऐसे में लॉ स्कूलों और लॉ फर्मों को मिलकर शिक्षण मॉडल, व्यावहारिक प्रशिक्षण, लाइव केस-आधारित एक्सपोजर और स्किल डेवलपमेंट फ्रेमवर्क तैयार करने होंगे।”

उन्होंने कहा, “कानूनी विमर्श ऐसी भाषा में होना चाहिए, जिसे समाज के अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति भी समझ सके।”

इस अवसर पर डॉ. ललित भसीन ने कहा, “न्याय व्यवस्था के विकास और उसे सशक्त बनाने में कानूनी शिक्षा की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए यह आवश्यक है कि लॉ स्कूलों के शिक्षक न केवल पूरी तरह योग्य और सक्षम हों, बल्कि वे वैश्विक स्तर पर कानून के क्षेत्र में हो रहे समकालीन बदलावों और नई प्रवृत्तियों से भी भली-भांति परिचित रहें।”

उन्होंने आगे कहा, “SILF और शारदा यूनिवर्सिटी ने इस फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम के माध्यम से लॉ फर्म विशेषज्ञों और लॉ स्कूल फैकल्टी के बीच एक अनूठी सहभागिता और ज्ञान-साझाकरण की पहल की है। यह केवल पहला कदम है। अगले चरण में इस तरह के संवाद और सहयोग को देशभर के लॉ स्कूलों तक विस्तारित किया जाएगा। SILF के सदस्य कानून की विभिन्न शाखाओं में अपनी विशेषज्ञता लॉ स्कूलों के शिक्षकों के साथ साझा करने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं। SILF हमेशा समाज को कुछ लौटाने में विश्वास करता है और यह पहल उसी प्रतिबद्धता का प्रतिबिंब है।”

25 मई से 6 जून तक चलने वाले इस 12 दिवसीय कार्यक्रम में देश की प्रमुख लॉ फर्मों और संस्थानों से जुड़े प्रतिष्ठित कानूनी विशेषज्ञ और प्रैक्टिशनर भाग लेंगे। आगामी सत्रों में कानून की भाषा, लॉ फर्म की संरचना, M&A, बैंकिंग एवं फाइनेंस, विवाद समाधान, प्रतिस्पर्धा कानून, ESG, लॉयरिंग स्किल्स, नेगोशिएशन, क्लाइंट कम्युनिकेशन, प्रोफेशनल एथिक्स, वर्कप्लेस कल्चर, लीगल टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कानूनी पेशे के भविष्य जैसे विषयों पर चर्चा होगी।

यह पहल SILF की उस सतत प्रतिबद्धता को दर्शाती है, जिसके तहत अकादमिक जगत और कानूनी उद्योग के बीच संस्थागत सहयोग को मजबूत करने के साथ-साथ फैकल्टी सदस्यों को लॉ फर्मों की कार्यप्रणाली और कानूनी पेशे में हो रहे समकालीन बदलावों की गहरी समझ प्रदान की जा रही है।

तकनीक, वैश्वीकरण और बदलती व्यावसायिक जरूरतों के कारण तेजी से बदल रहे कानूनी इकोसिस्टम के बीच इस तरह के फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम कानूनी शिक्षकों को कक्षा की पढ़ाई को व्यवहारिक वास्तविकताओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे और उद्योग की जरूरतों के अनुरूप कानूनी प्रतिभा तैयार करने में सहायक साबित होंगे।

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