New Delhi: जम्मू के केंद्रीय विश्वविद्यालय (CUJ) में पहला महत्वपूर्ण बौद्धिक एवं नीति-आधारित ‘सिंधु संवाद’ सफलतापूर्वक आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन जम्मू-कश्मीर की परामर्शनीति फाउंडेशन और नई दिल्ली की रेड लैंटर्न एनालिटिका (RLA) के बीच हुआ। केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू ने सिंधु सेंट्रल यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर इसकी मेजबानी की।सिंधु नदी प्रणाली की सभ्यतागत, सामरिक और पर्यावरणीय अहमियत को ध्यान में रखकर यह संवाद शुरू किया गया है। इसका मकसद इतिहास, नीति और भू-राजनीति को जोड़ते हुए एक व्यवस्थित चर्चा शुरू करना है।कार्यक्रम की शुरुआत प्रो. रितु बख्शी ने की, जो केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू में छात्र कल्याण की डीन हैं। उन्होंने परामर्शनीति फाउंडेशन की इस पहल की सराहना की और ‘सिंधु संवाद’ को एक ऐतिहासिक कदम बताया। प्रो. बख्शी ने कहा कि यह संवाद बहु-विषयक शोध का जीवंत उदाहरण है, जो भारत सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 से पूरी तरह मेल खाता है।
हिमालयी उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों की वायुमंडलीय और जलवायु परिवर्तन अध्ययन करने वाली वैज्ञानिक डॉ. श्वेता यादव ने सिंधु नदी प्रणाली के पर्यावरणीय पहलू पर प्रकाश डाला। उन्होंने सिंधु सेंट्रल यूनिवर्सिटी के साथ सहयोग की जरूरत पर जोर दिया।रेड लैंटर्न एनालिटिका के डायरेक्टर डॉ. सिद्धार्थ घोष ने ऑनलाइन शामिल होकर इस कार्यक्रम को “एक वास्तविक ऐतिहासिक पल” बताया। उन्होंने सभी प्रतिभागियों, खासकर प्रो. संजीव जैन और केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू के समर्पित शोधार्थियों एवं प्राध्यापकों को बधाई दी।डॉ. अजय सिंह ने सिंधु नदी की सभ्यतागत अहमियत पर चर्चा की और उसके ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व को विस्तार से बताया। इस संवाद को प्रोत्साहित करते हुए प्रो. संजीव जैन ने कहा कि केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू ज्ञान, शोध और सांस्कृतिक चर्चाओं को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है।यह संवाद में सिंधु नदी की सांस्कृतिक, जलवायु और सभ्यतागत महत्व पर बात होगी, खासकर इंडस वाटर ट्रीटी (IWT) के संदर्भ में, जो पिछले साल पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद फिलहाल निलंबित है।डॉ. तिलक ने जम्मू-कश्मीर में सिंधु नदी प्रणाली की सहायक नदियों के रणनीतिक और पारिस्थितिक महत्व को रेखांकित किया, और क्षेत्रीय जल सुरक्षा तथा आजीविका में उनकी भूमिका पर ज़ोर दिया।







