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भारत की मध्य पूर्व नीति: ‘4Ds और 4Es’ रणनीति; पूर्व राजनयिक और NTPC निदेशक Anil Trigunayat ने कहा: ‘स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ का बंद होना ‘स्वीकार्य नहीं’ 

Former Diplomat and NTPC's Independent Director Anil Kumar Trigunayat

नई दिल्ली (शेखर सुमन सिन्हा/दिक्षांत सूर्यवंशी): पूर्व राजनयिक और NTPC के स्वतंत्र निदेशक Anil Kumar Trigunayat ने शुक्रवार को कहा, “भारत लगातार समुद्री मार्गों की स्वतंत्र आवाजाही (फ्रीडम ऑफ नेविगेशन) की वकालत करता रहा है और स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ या किसी भी अन्य समुद्री संचार मार्ग (SLOC) को बंद करने के खिलाफ है।” भारत नीति न्यूज़ (BNN) को दिए एक विशेष साक्षात्कार में उन्होंने मध्य पूर्व में भारत की ‘4Ds और 4Es’ नीति को भी रेखांकित किया।

Anil Kumar Trigunayat भारत के जॉर्डन, लीबिया और माल्टा में राजदूत रह चुके हैं। वर्तमान में वे Vivekananda International Foundation(VIF) में विशिष्ट फेलो हैं, जहाँ वे वेस्ट एशिया एक्सपर्ट्स ग्रुप का नेतृत्व करते हैं। उनकी विशेषज्ञता के क्षेत्र वेस्ट एशिया, अफ्रीका, रूस और संघर्ष क्षेत्रों में भारत के हितों को आगे बढ़ाना हैं। उन्होंने Evolving Security Dynamics in West Asia and India’s Challenges (VIF) और West Asian Dynamics and Indian Imperative (How Academics, 2024) जैसी पुस्तकों का संपादन भी किया है।

पूरा साक्षात्कार यहां पढ़ें:


प्रश्न:

मध्य पूर्व में शांति निर्माण के प्रयासों में समन्वयकारी भूमिका निभाने का अवसर क्या भारत से चूक गया है, जबकि पाकिस्तान इस क्षेत्र का लाभ उठाने में सफल रहा है? इस संदर्भ में भारत को आगे क्या रणनीतिक कदम उठाने चाहिए?

उत्तर:

मेरे विचार से भारत किसी भी अवसर से नहीं चूका है और एक विश्वसनीय संवादकर्ता के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है। हमारी विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य सबसे पहले राष्ट्रीय हितों की सेवा करना है।

भारत ने मध्य पूर्व/वेस्ट एशिया में ‘4Ds’ की नीति अपनाई है, जो हमारे विस्तारित और अस्तित्वगत पड़ोस का हिस्सा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इसमें डायलॉग (संवाद), डिप्लोमेसी (कूटनीति), डी-हाइफनेशन और डी-एस्केलेशन (तनाव कम करना) शामिल हैं।

भारत ने शुरू से ही संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान पर जोर दिया है और सभी पक्षों से बातचीत और कूटनीति के जरिए समाधान निकालने का आग्रह किया है। इस क्षेत्र में भारत के हित ‘4Es’ से जुड़े हैं—

  • ऊर्जा और उर्वरक सुरक्षा
  • व्यापक आर्थिक जुड़ाव
  • लगभग 1 करोड़ प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और कल्याण
  • समुद्री मार्गों की सुगमता (Ease of Navigation), क्योंकि हमारा 80–85% व्यापार समुद्री मार्गों, खासकर स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से गुजरता है

इसी कारण भारत समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता का समर्थन करता है और स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ या किसी भी SLOC को बंद करने के खिलाफ है।

प्रवासी भारतीय हर साल भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगभग 10% योगदान भी देते हैं। इसलिए प्रधानमंत्री Narendra Modi और डॉ. S. Jaishankar क्षेत्रीय और वैश्विक नेताओं से लगातार संपर्क में रहे हैं। प्रधानमंत्री ने ईरान के राष्ट्रपति डॉ. पेज़ेश्कियन और इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू से बात कर शत्रुता समाप्त करने का आग्रह किया है।

भारत एक ऐसा देश है जिसके नेता सभी पक्षों से सीधे और स्पष्ट बातचीत कर सकते हैं—यह विशेषाधिकार पाकिस्तान सहित कई देशों के पास नहीं है। भारत को एक निष्पक्ष, न्यायपूर्ण और शांतिप्रिय शक्ति के रूप में देखा जाता है और वह शांत लेकिन लगातार कूटनीति के जरिए तनाव कम करने की कोशिश कर रहा है।


प्रश्न:

वर्तमान ऊर्जा संकट से निपटने में WTO और BRICS जैसी आर्थिक संस्थाओं की क्या भूमिका हो सकती है?

उत्तर:

जहां तक BRICS का सवाल है, भारत वर्तमान में इसका अध्यक्ष है, लेकिन दुर्भाग्य से इसके तीन सदस्य—ईरान, यूएई और सऊदी अरब—प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस संघर्ष का हिस्सा हैं। ऐसे में साझा रुख बनाना आसान नहीं रहा है। हालांकि जल्द ही BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक होने वाली है और उम्मीद है कि कोई समाधान निकल सकता है।

GCC और ईरान के बीच जो संबंध सुधार की दिशा में बढ़ रहे थे, उनमें भी दरार आई है और सामान्य होने में समय लगेगा।

जहां तक WTO की बात है, वह खुद विश्वास के संकट से जूझ रहा है और इस संघर्ष में उसकी बड़ी भूमिका की संभावना कम है।


प्रश्न:

वेस्ट एशिया संघर्ष के बाद भारत की विदेश नीति के सामने कौन-कौन सी चुनौतियां उभर कर आई हैं?

उत्तर:

भारत के लिए वेस्ट एशिया में स्थिरता, सुरक्षा और बड़े क्षेत्रीय संघर्षों से बचाव प्राथमिकता रही है। आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाधा और उसके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों से निपटने के लिए केंद्रित रणनीति की जरूरत है।

सरकार ने विविधीकरण जैसे कई कदम उठाए हैं। हालांकि द्विपक्षीय संबंध मजबूत रहेंगे, लेकिन क्षेत्रीय परियोजनाएं जैसे INSTC और IMEC अधिक चुनौतियों का सामना कर सकती हैं।

हाल के समय में पाकिस्तान और अन्य विरोधी तत्वों की सक्रियता के चलते भारत को अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है।


प्रश्न:

क्या भारत ने इज़राइल-ईरान युद्ध की आशंका जताई थी?

उत्तर:

मैं सरकार की आंतरिक सोच से अवगत नहीं हूं, लेकिन यह क्षेत्र हमेशा से अस्थिर रहा है। ईरान और इज़राइल के बीच तनाव, फिलिस्तीन मुद्दे का समाधान न होना, और 2025 के जून में 12 दिन के युद्ध जैसी घटनाओं को देखते हुए इस तरह के संघर्ष की संभावना पहले से थी।

पहले अमेरिका स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल में स्थिति बिगड़ गई और अब इसका वैश्विक प्रभाव देखा जा रहा है।


प्रश्न:

क्या भारत को अब्राहम समझौते (Abraham Accords) को मजबूत करने में इज़राइल का समर्थन करना चाहिए?

उत्तर:

भारत ने हमेशा क्षेत्र में संबंध सुधार (rapprochement) का समर्थन किया है और अब्राहम समझौतों का भी स्वागत किया है। लेकिन भारत इसे किसी सैन्य गठबंधन या ‘ज़ीरो-सम गेम’ के रूप में नहीं देखता।

वर्तमान में इस संघर्ष में शामिल लगभग सभी देश भारत के रणनीतिक साझेदार हैं। भारत के अपने महत्वपूर्ण क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय पहल—जैसे I2U2, IMEC और INSTC—इज़राइल और ईरान दोनों के साथ जुड़े हैं, जो बदलते वैश्विक परिदृश्य में बेहद महत्वपूर्ण हैं।

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