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मध्य पूर्व संकट से वैश्विक हाइड्रोजन आपूर्ति शृंखला की कमजोरियां उजागर, कम-उत्सर्जन विकल्पों के विस्तार में चुनौतियां शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने नीट-यूजी पुनर्परीक्षा की तैयारियों का आकलन करने के लिए उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की टाटा मोटर्स ने जुलाई 2026 से वाणिज्यिक वाहनों की कीमतों में बढ़ोतरी की घोषणा की कोयला क्षेत्र में परिसंपत्ति मुद्रीकरण पहल के तहत BCCL ने दुग्दा कोल वाशरी का स्थल जेएसडब्ल्यू स्टील को सौंपा Nykaa ने वित्त वर्ष 2030 तक ब्यूटी और लाइफस्टाइल कारोबार का जीएमवी 5 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा स्टील एक्सचेंज इंडिया लिमिटेड ने अतिरिक्त 15 करोड़ रुपये का टर्म लोन चुकाया, ऋण में कमी 86 करोड़ रुपये के पार

मध्य पूर्व संकट से वैश्विक हाइड्रोजन आपूर्ति शृंखला की कमजोरियां उजागर, कम-उत्सर्जन विकल्पों के विस्तार में चुनौतियां

Image courtesy: IEA

नई दिल्ली: मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने हाइड्रोजन आधारित उत्पादों के वैश्विक उत्पादन और व्यापार को प्रभावित किया है, जिससे उर्वरक उत्पादन, रिफाइनिंग और रसायन विनिर्माण से जुड़ी आपूर्ति शृंखलाओं की कमजोरियां उजागर हुई हैं। यह जानकारी अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) की नई रिपोर्ट में दी गई है।

आईईए की ग्लोबल हाइड्रोजन रिव्यू की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा संकट ने दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के विकल्प के रूप में हाइड्रोजन और हाइड्रोजन आधारित ईंधनों में रुचि फिर से बढ़ा दी है। हालांकि, कम-उत्सर्जन हाइड्रोजन का उत्पादन अभी उस स्तर से काफी दूर है, जहां वह तत्काल समाधान प्रदान कर सके।

रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2025 में दुनिया भर में हाइड्रोजन की मांग 10 करोड़ टन से अधिक रही, जबकि कम-उत्सर्जन हाइड्रोजन का उत्पादन 20% बढ़कर लगभग 10 लाख टन तक पहुंच गया। इसके बावजूद ऊंची लागत, मांग को लेकर अनिश्चितता, जटिल नियमों और बुनियादी ढांचे की कमी जैसी चुनौतियां कम-उत्सर्जन हाइड्रोजन के विकास की रफ्तार को धीमा कर रही हैं। इसके चलते वर्ष 2030 के लिए सरकारों द्वारा घोषित लक्ष्यों को हासिल करना लगातार कठिन होता जा रहा है।

आईईए के कार्यकारी निदेशक फातिह बायरोल ने कहा कि मौजूदा संकट ने यह दिखाया है कि दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं उर्वरकों, ईंधनों और औद्योगिक कच्चे माल जैसे हाइड्रोजन आधारित उत्पादों के व्यापार पर कितनी निर्भर हैं तथा इन आपूर्ति शृंखलाओं में मध्य पूर्व की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने कहा कि देश अपनी ऊर्जा प्रणालियों को अधिक लचीला और विविधतापूर्ण बनाने के उपाय तलाश रहे हैं। कम-उत्सर्जन हाइड्रोजन इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, लेकिन इसके लिए नीतिगत समर्थन और तेज गति से विस्तार की आवश्यकता होगी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्य पूर्व संघर्ष का सबसे अधिक असर उर्वरक बाजारों पर पड़ा है। यह क्षेत्र वैश्विक हाइड्रोजन उत्पादन का लगभग छठा हिस्सा प्रदान करता है और अमोनिया, यूरिया, मेथनॉल तथा परिष्कृत उत्पादों के वैश्विक व्यापार में प्रमुख भूमिका निभाता है।

उत्पादन, निर्यात और समुद्री परिवहन मार्गों में व्यवधान के कारण वैश्विक बाजारों में कमी और कीमतों में अस्थिरता देखी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, आपूर्ति बाधाओं, प्राकृतिक गैस की बढ़ती कीमतों और निर्यात प्रतिबंधों के चलते जनवरी से मई 2026 के बीच यूरिया की कीमतें दोगुनी हो गईं। उर्वरकों की बढ़ती लागत खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं के लिए जोखिम पैदा कर रही है, विशेष रूप से उन कृषि अर्थव्यवस्थाओं में जो आयात पर निर्भर हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 में कम-उत्सर्जन हाइड्रोजन का उत्पादन नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने और पहली बार वैश्विक हाइड्रोजन उत्पादन में 1% से अधिक हिस्सेदारी हासिल करने की संभावना है। हालांकि, 2025 में निवेश की गति कमजोर पड़ गई। अंतिम निवेश निर्णयों में देरी और परियोजनाओं की घटती संख्या इस क्षेत्र के सामने मौजूद चुनौतियों को दर्शाती है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ बाजारों में नीतिगत समर्थन जारी रहने के बावजूद अधिकांश स्थानों पर कम-उत्सर्जन हाइड्रोजन और हाइड्रोजन आधारित उत्पाद पारंपरिक विकल्पों की तुलना में काफी महंगे बने हुए हैं। ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए विविधीकरण महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन इससे अतिरिक्त लागत भी जुड़ सकती है। इसी कारण 2030 तक कम-उत्सर्जन हाइड्रोजन उत्पादन के लिए घोषित परियोजनाओं की क्षमता पिछले वर्ष की तुलना में लगभग एक-चौथाई घटकर 2.7 करोड़ टन रह गई है। देरी और रद्द होने वाली परियोजनाएं इसका प्रमुख कारण हैं। वहीं, जिन परियोजनाओं के लिए अंतिम निवेश निर्णय हो चुका है या जिनके 2030 तक परिचालन में आने की संभावना है, उनकी क्षमता पिछले वर्ष के 1 करोड़ टन से घटकर 60 लाख टन से कुछ अधिक रह गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, मांग अब भी सबसे बड़ी कमी बनी हुई है। वर्ष 2025 में कम-उत्सर्जन हाइड्रोजन के लिए नए खरीद समझौतों की मात्रा लगभग स्थिर रही। नए अनुबंधों में शामिल केवल करीब 20% मात्रा ही ठोस संविदात्मक प्रतिबद्धताओं से समर्थित थी। मांग को लेकर यह अनिश्चितता निवेश में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बनी हुई है।

इलेक्ट्रोलाइजर की स्थापना के मामले में चीन अग्रणी बना हुआ है। वर्ष 2025 में वैश्विक स्थापित क्षमता दोगुनी होकर 4 गीगावाट पहुंच गई, जिसमें नई स्थापनाओं का लगभग 75% हिस्सा चीन का रहा। हालांकि, रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि वृद्धि की गति धीमी पड़ रही है, क्योंकि इलेक्ट्रोलिसिस के माध्यम से हाइड्रोजन उत्पादन की नई परियोजनाओं के लिए निवेश निर्णयों में पहली बार गिरावट दर्ज की गई। 2025 के अंत में घोषित नई नीतिगत सहायता से आने वाले वर्षों में वृद्धि को फिर से गति मिलने की उम्मीद है।

यूरोप में सहायता कार्यक्रमों और नियामकीय आवश्यकताओं से विशेष रूप से रिफाइनिंग क्षेत्र की परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में मदद मिल रही है। हालांकि, प्रमुख नियमों के धीमे क्रियान्वयन के कारण निवेश और विस्तार की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। वहीं उत्तरी अमेरिका, भारत और जापान में भी प्रगति देखने को मिल रही है, लेकिन नियमों, प्रोत्साहनों और भविष्य की मांग को लेकर अनिश्चितता अब भी चुनौती बनी हुई है।

रिपोर्ट में अफ्रीका के सामने मौजूद अवसरों और चुनौतियों का भी उल्लेख किया गया है। महाद्वीप के पास प्रचुर नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन हैं और कम-उत्सर्जन हाइड्रोजन उत्पादन की दीर्घकालिक संभावनाएं भी मजबूत हैं, लेकिन इसका विकास अभी शुरुआती चरण में है। वर्तमान में अफ्रीका में केवल लगभग 6,000 टन कम-उत्सर्जन हाइड्रोजन का उत्पादन हो रहा है और वर्ष 2030 तक परिचालन शुरू करने के लक्ष्य वाली घोषित 34 परियोजनाओं में से किसी ने भी अभी अंतिम निवेश निर्णय प्राप्त नहीं किया है।

रिपोर्ट के अनुसार, हाइड्रोजन औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने, घरेलू उर्वरक उत्पादन के जरिए खाद्य सुरक्षा मजबूत करने और इस्पात निर्माण जैसे क्षेत्रों में अफ्रीकी देशों को मूल्य शृंखला में आगे बढ़ने में मदद कर सकता है। हालांकि, इसकी सफलता वित्तपोषण लागत को कम करने और हाइड्रोजन रणनीतियों को व्यापक आर्थिक विकास प्राथमिकताओं के साथ जोड़ने पर निर्भर करेगी।

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