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World Energy Investment Report: मध्य पूर्व संघर्ष के प्रभाव से ऊर्जा निवेश योजनाओं में बदलाव तय, बाधाओं के बीच सुरक्षा पर बढ़ा जोर

IEA Executive Director Fatih Birol

नई दिल्ली: मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के दूरगामी प्रभावों के चलते ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार प्रवाह की विश्वसनीयता को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच देश और कंपनियां अपनी ऊर्जा निवेश रणनीतियों पर पुनर्विचार कर रही हैं। यह जानकारी अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) की नई रिपोर्ट में दी गई है।

IEA की वार्षिक ‘वर्ल्ड एनर्जी इन्वेस्टमेंट 2026’ रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावी रूप से बंद होने से उत्पन्न मौजूदा ऊर्जा संकट जोखिम संबंधी धारणाओं को बदल रहा है और ऊर्जा स्रोतों एवं आपूर्ति मार्गों में विविधता बढ़ाने की दिशा में प्रयासों को मजबूती दे रहा है। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध से पैदा हुए ऊर्जा संकट के कुछ वर्षों बाद आया यह नया आपूर्ति झटका भविष्य की निवेश प्राथमिकताओं पर दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ने की संभावना रखता है, खासकर एशिया और मध्य पूर्व में, जहां होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले शिपिंग प्रवाह में बाधा का असर सबसे अधिक महसूस किया गया है।

IEA के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल ने कहा, “दुनिया अब तक के सबसे बड़े ऊर्जा सुरक्षा संकट के बीच है और मेरा मानना है कि इससे वैश्विक निवेश रणनीतियां उसी तरह बदलेंगी जैसे 1970 के दशक के तेल संकट के बाद ऊर्जा क्षेत्र में बड़े बदलाव देखने को मिले थे।”

उन्होंने कहा कि उत्पादक और उपभोक्ता दोनों देश व्यापार मार्गों और ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने के प्रयास तेज कर रहे हैं। इसमें नई पाइपलाइन और आपूर्ति अवसंरचना का विकास तथा घरेलू स्तर पर उपलब्ध संसाधनों जैसे नवीकरणीय ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा, कोयला, तेल और गैस पर अधिक ध्यान शामिल है। साथ ही बिजली प्रणालियों को मजबूत करने, विद्युतीकरण बढ़ाने और ऊर्जा दक्षता को तेज करने पर भी जोर दिया जा रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में वैश्विक ऊर्जा निवेश 3.4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में मामूली वृद्धि दर्शाता है। इसमें से करीब 2.2 ट्रिलियन डॉलर ग्रिड, स्टोरेज, कम-उत्सर्जन ईंधन, परमाणु ऊर्जा, नवीकरणीय ऊर्जा, दक्षता और विद्युतीकरण पर खर्च किए जाने की संभावना है, जबकि तेल, प्राकृतिक गैस और कोयला क्षेत्र में लगभग 1.2 ट्रिलियन डॉलर निवेश होने का अनुमान है।

ऊंची तेल कीमतों के बावजूद 2026 में तेल क्षेत्र में निवेश लगातार तीसरे वर्ष घटकर 500 अरब डॉलर से नीचे रहने का अनुमान है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कीमतों में उछाल की अवधि को लेकर अनिश्चितता, लंबी परियोजना समय-सीमा, आपूर्ति श्रृंखला की बाधाएं और अपतटीय रिग बाजार की तंगी के कारण मध्य पूर्व के बाहर निकट अवधि में निवेश सीमित बना हुआ है।

वहीं, प्राकृतिक गैस क्षेत्र में निवेश बढ़कर 330 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जो एक दशक का उच्चतम स्तर होगा। इसे अमेरिका और कतर में नई LNG निर्यात परियोजनाओं से समर्थन मिल रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ईंधन आयातक देशों के बीच घरेलू स्तर पर उपलब्ध ऊर्जा स्रोतों जैसे नवीकरणीय ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा और कुछ मामलों में कोयले में रुचि बढ़ रही है। 2026 में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश लगभग 665 अरब डॉलर रहने का अनुमान है, जिसमें अकेले सौर ऊर्जा पर 365 अरब डॉलर खर्च होने की संभावना है।

हालांकि नवीकरणीय ऊर्जा निवेश की वार्षिक वृद्धि दर पिछले कुछ वर्षों की तेज रफ्तार के बाद धीमी हुई है, फिर भी वैश्विक बिजली उत्पादन निवेश में कम-उत्सर्जन स्रोतों की हिस्सेदारी 70% से अधिक बनी हुई है। परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में भी निवेश बढ़कर सालाना 80 अरब डॉलर से अधिक हो गया है और 15 देशों में करीब 80 गीगावाट नई परमाणु क्षमता निर्माणाधीन है।

दूसरी ओर, कोयला क्षेत्र में निवेश 2026 में बढ़कर 180 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जो 2012 के बाद का उच्चतम स्तर होगा। वैश्विक कोयला आपूर्ति निवेश में चीन की हिस्सेदारी लगभग 70% रहने की संभावना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा संकट से प्रभावित कुछ एशियाई देश ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए मौजूदा कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को लंबे समय तक चालू रख सकते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले ऊर्जा संकटों की तरह इस बार भी ऊर्जा दक्षता पर नीतिगत ध्यान बढ़ा है। हाल के वर्षों में ऊर्जा दक्षता नीतियों का दायरा बढ़ा है और दुनियाभर में हर साल करीब 350 अरब डॉलर दक्षता सुधार पर निवेश किया जा रहा है। IEA के अनुसार, लगभग 20 देशों ने इस संकट के बाद ऊर्जा दक्षता सुधार के लिए नई नीतियों की घोषणा की है।

हालांकि, मध्य पूर्व संघर्ष भविष्य की ऊर्जा परियोजनाओं के वित्तपोषण को भी जटिल बना रहा है। संघर्ष के कारण वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ी है, जिससे अल्पकालिक निवेश निर्णय धीमे पड़े हैं और दीर्घकालिक वित्तपोषण लागत बढ़ी है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इसका सबसे अधिक असर पूंजी-गहन ऊर्जा प्रौद्योगिकियों और उभरती एवं विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है, जहां वित्तपोषण लागत पहले से ही विकसित देशों की तुलना में अधिक है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक ऊर्जा निवेश में बिजली क्षेत्र से जुड़ा निवेश सबसे प्रमुख रुझान बना हुआ है। 2026 में बिजली आपूर्ति और अवसंरचना में निवेश करीब 1.6 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि अंतिम उपयोग के विद्युतीकरण को शामिल करने पर यह आंकड़ा 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।

बिजली ग्रिड पर खर्च करीब 550 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है, जो सालाना आधार पर लगभग 20% अधिक होगा। वहीं बैटरी स्टोरेज निवेश 100 अरब डॉलर से अधिक रहने की संभावना है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि डेटा सेंटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के तेजी से विस्तार से बढ़ती बिजली मांग भी कुछ बाजारों, विशेषकर अमेरिका में, ऊर्जा निवेश रुझानों को प्रभावित कर रही है। 2025 में नए गैस आधारित बिजली संयंत्रों के ऑर्डर 25 वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए, जिसमें डेटा सेंटर की मांग की बड़ी भूमिका रही। अमेरिका और मध्य पूर्व में मजबूत मांग के कारण दुनिया के अन्य हिस्सों में निकट अवधि के लिए टर्बाइन उपलब्धता सीमित हो रही है।

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