नई दिल्ली: यूरोपीय संघ (ईयू) को भारत से इस्पात और एल्युमिनियम का निर्यात वित्त वर्ष 2025 में 24.4 प्रतिशत घट गया। इस दौरान केवल इस्पात का निर्यात 35.1 प्रतिशत कम रहा। यह गिरावट ऐसे समय दर्ज की गई, जब कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) के तहत कोई वित्तीय दायित्व लागू नहीं हुआ था। यह रुझान संकेत देता है कि यूरोपीय खरीदार पहले से ही कम उत्सर्जन वाले उत्पादकों की ओर रुख कर रहे हैं। ऐसे में भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) के परिचालन चरण में प्रवेश के साथ इसकी अहमियत और बढ़ गई है। अगले दो से पांच वर्षों में नियामकों, नीति-निर्माताओं और बाजार से जुड़े पक्षों द्वारा बाजार संरचना, अनुपालन दायित्वों और मूल्य निर्धारण से जुड़े फैसले तय करेंगे कि CCTS 15 से 30 वर्षों की अवधि वाले पूंजी-गहन औद्योगिक निवेश को दिशा देने में कितनी सक्षम बनती है।
इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (IEEFA) ने एनवायरनमेंटल डिफेंस फंड (EDF) के सहयोग से ‘द रोड अहेड फॉर इंडियाज़ कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम’ शीर्षक से नई रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट में CCTS के अगले चरण की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए योजना की दिशा तय करने वाले प्रमुख निर्णयों पर सिफारिशें दी गई हैं। विश्लेषण को चार परस्पर जुड़े विषयों पर आधारित किया गया है। इनमें वित्तीय बाजार की भागीदारी, सीमा-आधारित कार्बन लागतों विशेषकर CBAM के संदर्भ में भारत के सामने मौजूद नीतिगत विकल्प, बिजली क्षेत्र को शामिल करने सहित विभिन्न क्षेत्रों में विस्तार, तथा भारत के कार्बन बाजार और संप्रभु उत्सर्जन-नियंत्रण लक्ष्यों की विश्वसनीयता बनाए रखते हुए ऑफसेट और पेरिस समझौते के अनुच्छेद-6 से जुड़े अवसरों का प्रबंधन शामिल है।
रिपोर्ट में समान प्रकार की अंतरराष्ट्रीय प्रणालियों के अनुभवों का भी उल्लेख किया गया है। दक्षिण कोरिया में शुरुआती चरण में केवल अनुपालन संस्थाओं तक भागीदारी सीमित रखने और कार्बन भत्तों की अधिकता के कारण शुरुआती वर्षों में कारोबार सीमित रहा और कीमतें दबाव में रहीं। भारत की परफॉर्म, अचीव एंड ट्रेड (PAT) योजना में भी प्रमाणपत्रों का कारोबार निर्धारित स्तर तक नहीं पहुंच सका। रिपोर्ट के अनुसार, इन दोनों अनुभवों से यह स्पष्ट होता है कि बाजार की गहराई और प्रभावी मूल्य संकेत तभी विकसित होते हैं, जब अनुपालन लक्ष्य वास्तविक दबाव पैदा करें और उन्हें लगातार बनाए रखा जाए।

रिपोर्ट के सह-लेखक तथा IEEFA दक्षिण एशिया में सतत वित्त और कार्बन बाजार के लीड स्पेशलिस्ट सौरभ त्रिवेदी ने कहा कि सभी प्रमुख उत्सर्जन व्यापार प्रणालियों (ETS) की शुरुआत केवल अनुपालन संस्थाओं के साथ हुई थी और CCTS का ऐसा करना भी उचित है। उनके अनुसार, वित्तीय मध्यस्थ बाद के चरण में निरंतर मूल्य खोज और हेजिंग जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे कंपनियों को लंबे समय के लिए बड़े स्तर पर डीकार्बोनाइजेशन निवेश करने का भरोसा मिलता है। उन्होंने कहा कि इसके लिए पहले बाजार में वास्तविक कमी और प्रभावी अनुपालन व्यवस्था स्थापित करना आवश्यक है।
CBAM के संदर्भ में रिपोर्ट में मीडिया में प्रकाशित आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि वित्त वर्ष 2025 में ईयू को भारत के इस्पात और एल्युमिनियम निर्यात में 24.4 प्रतिशत तथा केवल इस्पात निर्यात में 35.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इससे संकेत मिलता है कि यूरोपीय खरीदार पहले ही कम उत्सर्जन वाले उत्पादकों की ओर रुख कर रहे हैं। रिपोर्ट में CBAM पर जारी अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं के बजाय घरेलू कार्बन बाजार की संरचना पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया है।
रिपोर्ट के सह-लेखक और IEEFA में जलवायु वित्त विश्लेषक एवं सलाहकार शुभम श्रीवास्तव ने कहा कि अब यह महत्वपूर्ण होगा कि तीसरे देशों में चुकाई गई कार्बन कीमतों को यूरोपीय संघ किस प्रकार मान्यता देता है और यह भारत के बाजार ढांचे के साथ कैसे जुड़ता है। उनके अनुसार, CCTS को इस प्रकार विकसित किया जा सकता है कि घरेलू कार्बन लागतों को सीमा पर मान्यता मिल सके। उन्होंने कहा कि मजबूत घरेलू कार्बन बाजार औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाता है और कार्बन मूल्य का अधिक हिस्सा भारत के भीतर बनाए रखने में मदद करता है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में बिजली क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है, लेकिन इसे शुरुआती अनुपालन दायरे में शामिल नहीं किया गया है। इसे एक चरणबद्ध रणनीति बताया गया है, जिसके तहत पहले औद्योगिक क्षेत्रों को शामिल किया गया है, जबकि बिजली क्षेत्र से जुड़ी संरचनात्मक और संक्रमणकालीन जटिलताओं को अलग से देखा जा रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि योजना के विकसित होने के साथ यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा कि भविष्य में बिजली क्षेत्र को कब और किस प्रकार शामिल किया जाएगा, क्योंकि बिजली परिसंपत्तियों का परिचालन जीवन काफी लंबा होता है।
IEEFA दक्षिण एशिया में इंडिया क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन की ऊर्जा विशेषज्ञ और रिपोर्ट की सह-लेखक सलोनी सचदेवा माइकल ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताते हैं कि विनियमित बिजली बाजार भी कार्बन मूल्य निर्धारण का समर्थन कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि चीन ने विनियमित बिजली टैरिफ व्यवस्था के बावजूद अपने ETS की शुरुआत बिजली क्षेत्र से की थी। उनके अनुसार, भारत के बिजली क्षेत्र में भी बिजली खरीद समझौतों में मौजूद ‘चेंज-इन-लॉ’ जैसे प्रावधान कार्बन अनुपालन लागत की वसूली में सहायक हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में बिजली क्षेत्र को CCTS में शामिल करते समय बिजली बाजार विनियमन, डिस्पैच व्यवस्था, लागत वसूली तंत्र और कार्बन बाजार तथा बिजली नियामकों के बीच समन्वय पर सावधानीपूर्वक विचार करना होगा।
रिपोर्ट में पेरिस समझौते के अनुच्छेद-6 के तहत भारत के अवसरों और ऑफसेट की भूमिका पर भी चर्चा की गई है। इसमें कहा गया है कि अनुपालन बाजार के स्थिर होने के बाद ही इन पहलुओं को आगे बढ़ाना बेहतर होगा। शुभम श्रीवास्तव ने कहा कि ऑफसेट को बाजार की परिस्थितियों के अनुरूप क्रमबद्ध तरीके से लागू किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण अवसर अनुच्छेद-6 के तहत उच्च गुणवत्ता वाले उत्सर्जन-नियंत्रण परिणामों को अधिकृत करने में है, विशेष रूप से उन परियोजनाओं के लिए जिनमें उत्सर्जन में कमी की लागत अधिक है। इससे ऐसे उत्सर्जन-नियंत्रण प्रयासों के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्त आकर्षित किया जा सकेगा, जबकि भारत के अपने लक्ष्यों के लिए आवश्यक कम लागत वाले उत्सर्जन-नियंत्रण देश के भीतर ही बनाए रखे जा सकेंगे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रभावी कार्बन बाजार की मजबूत बुनियाद बनाना फिलहाल प्राथमिकता है, लेकिन वित्तीय एकीकरण, बिजली क्षेत्र को शामिल करना, सीमा-आधारित कार्बन उपायों के साथ तालमेल और सुसंगत ऑफसेट ढांचे जैसे उन्नत पहलुओं की शुरुआती चरण में ही योजना बनाना आवश्यक है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत ऐसे चरण में है जहां इन सभी विकल्पों पर अभी निर्णय लिए जाने बाकी हैं और वर्तमान में लिए गए फैसले आने वाले वर्षों में कार्बन बाजार की दिशा तय करेंगे।







