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हकेवि को हरियाणा सरकार से 40 लाख रुपये की प्रतिष्ठित शोध परियोजना प्राप्त

New Delhi: हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय (हकेवि), महेंद्रगढ़ के जैव प्रौद्योगिकी विभाग को हरियाणा राज्य विज्ञान, नवाचार एवं प्रौद्योगिकी परिषद (एचएससीएसआईटी), हरियाणा सरकार से 40 लाख रुपये की एक प्रतिष्ठित शोध परियोजना प्राप्त हुई है। ‘क्रिस्पर-बेस्ड स्टैकिंग ऑफ फैटी एसिड बायोसिंथेसिस जीन्स टू इम्प्रूव ऑयल क्वालिटी इन प्रीवियसली एडिटेड एबायोटिक-स्ट्रेस रेजिलिएंट मस्टर्ड (ब्रैसिका जुनसिया (एल.) चेर्न)‘ विषयक इस परियोजना का संचालन जैव प्रौद्योगिकी विभाग की डॉ. हुमायरा सोनाह एवं प्रो. रूपेश देशमुख, जैव रसायन विभाग प्रो. पवन कुमार मौर्य तथा पर्यावरण विज्ञान विभाग डॉ. मोना शर्मा द्वारा किया जाएगा।

परियोजना स्वीकृत होने के उपरांत शोध दल ने विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. टंकेशवर कुमार व समकुलपति  प्रो. पवन कुमार शर्मा कर उनका मार्गदर्शन प्राप्त किया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने शोधकर्ताओं को इस प्रतिष्ठित अनुदान की प्राप्ति पर बधाई देते हुए कृषि जैव प्रौद्योगिकी एवं नवाचार आधारित अनुसंधान के क्षेत्र में उनके योगदान की सराहना की।

यह शोध परियोजना उन्नत ’क्रिस्पर जीन संपादन तकनीक’ के माध्यम से पूर्व में विकसित अजैविक तनाव-सहिष्णु सरसों की किस्मों में फैटी एसिड जैवसंश्लेषण से जुड़े महत्वपूर्ण जीनों का समावेशन करने पर केंद्रित है। इस शोध का उद्देश्य सरसों के तेल की पोषण गुणवत्ता एवं व्यावसायिक उपयोगिता में सुधार करना है, साथ ही फसल की सूखा एवं लवणता जैसी प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों के प्रति सहनशीलता को बनाए रखना है।

विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. टंकेशवर कुमार ने कहा कि यह परियोजना जलवायु-अनुकूल एवं पोषण-संपन्न सरसों की उन्नत किस्मों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस शोध से न केवल कृषि क्षेत्र को लाभ मिलेगा, बल्कि विश्वविद्यालय की अनुसंधान एवं नवाचार क्षमताओं को भी नई दिशा प्राप्त होगी। प्रो. पवन कुमार शर्मा ने भी शोध दल को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि इस प्रकार की अंतर्विषयी परियोजनाएं विश्वविद्यालय में उत्कृष्ट शोध संस्कृति को और सुदृढ़ करती हैं।

यह अंतर्विषयी परियोजना कृषि जैव प्रौद्योगिकी एवं जीनोम संपादन अनुसंधान के क्षेत्र में विश्वविद्यालय की बढ़ती क्षमता को दर्शाती है। परियोजना के परिणाम जलवायु-सहिष्णु एवं उच्च गुणवत्ता वाली तिलहनी फसलों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देंगे, जिससे सतत कृषि, पोषण सुरक्षा तथा खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा।

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