नई दिल्ली: भारतीय इस्पात कंपनियों के घोषित डीकार्बोनाइजेशन लक्ष्यों और उन्हें हासिल करने के लिए उठाए जा रहे ठोस कदमों के बीच बढ़ती खाई आने वाले दशकों तक उच्च-उत्सर्जन वाली प्रौद्योगिकियों को स्थायी बना सकती है। इससे नेट-जीरो की दिशा में उनकी प्रगति धीमी पड़ने, और इस्पात क्षेत्र की दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर होने का जोखिम बढ़ रहा है।
इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (आईईईएफए) की नई रिपोर्ट ‘डिकार्बोनाइजेशन रेडीनेस इन इंडिया’स स्टील सेक्टर’ में कहा गया है कि भारतीय इस्पात क्षेत्र ने पेरिस समझौते के अनुरूप जलवायु लक्ष्यों को अपनाया है। हालांकि, इस महत्वाकांक्षा के अनुरूप परिचालन, प्रौद्योगिकी और वित्तीय ढांचे के निर्माण में समान प्रगति नहीं दिख रही है। रिपोर्ट के अनुसार, अगले एक दशक में कंपनियों, निवेशकों और सरकार द्वारा लिए जाने वाले फैसले भारत में इस्पात क्षेत्र के डीकार्बोनाइजेशन की दिशा तय करेंगे।
आईईईएफए में साउथ एशिया के लिए सस्टेनेबल फाइनेंस एंड कार्बन मार्केट्स के लीड स्पेशलिस्ट डॉ. सौरभ त्रिवेदी ने कहा, “भारत का इस्पात उद्योग एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक है। जहां अन्य प्रमुख इस्पात उत्पादक क्षेत्रों में मांग स्थिर हो गई है या घट रही है, वहीं भारत में यह क्षेत्र तेज वृद्धि के दौर में है। ऐसे में भारतीय कंपनियां अगले कुछ वर्षों में जो विकल्प चुनेंगी, उनका असर मध्य सदी तक वैश्विक इस्पात क्षेत्र के उत्सर्जन पर गहरा पड़ेगा।”

विश्लेषकों ने 10 इस्पात उत्पादकों के नमूने का आकलन किया, जिनमें सात भारतीय और तीन वैश्विक कंपनियां शामिल थीं। इसमें उनके घोषित उत्सर्जन कटौती लक्ष्यों और रणनीतिक योजना, परिचालन क्षमता तथा वित्तीय समन्वय जैसे क्षेत्रों में उठाए गए कदमों के बीच संबंध का मूल्यांकन किया गया। आकलन में शामिल भारतीय कंपनियां थीं— जेएसडब्ल्यू स्टील, टाटा स्टील, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल), जिंदल स्टील, राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड (आरआईएनएल), जिंदल स्टेनलेस लिमिटेड और गोदावरी पावर एंड इस्पात लिमिटेड (जीपीआईएल)। वैश्विक कंपनियों में आर्सेलरमित्तल, पॉस्को और निप्पॉन स्टील शामिल रहीं।
रिपोर्ट में पाया गया कि जलवायु महत्वाकांक्षा, क्रियान्वयन से आगे निकल चुकी है। आकलन में शामिल सात भारतीय कंपनियों में से पांच ने 2050 तक पेरिस-अनुरूप नेट-जीरो लक्ष्य अपनाए हैं, लेकिन मूल्यांकन के पांच प्रमुख मानकों पर उनका प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा। इसके अलावा, अधिकांश भारतीय इस्पात कंपनियों की उत्सर्जन तीव्रता पिछले तीन वर्षों में बढ़ी है, जबकि वैश्विक प्रतिस्पर्धियों ने इसमें कमी दर्ज की है।
आईईईएफए में साउथ एशिया की एनर्जी फाइनेंस एनालिस्ट सोनी तिवारी ने कहा, “कंपनियों ने लक्ष्य तय किए हैं और अग्रणी कंपनियों में प्रौद्योगिकी योजना भी आगे बढ़ रही है, लेकिन पूंजी आवंटन में अपेक्षित बदलाव नहीं आया है। इस बीच उत्सर्जन गलत दिशा में जा रहा है, और यदि तकनीकी बदलाव में तेजी नहीं लाई गई तो क्षेत्र के विस्तार के साथ यह समस्या और बढ़ेगी।”
रिपोर्ट के अनुसार, ब्लास्ट फर्नेस (बीएफ) आमतौर पर 20 से 25 वर्षों तक संचालित होती है और हर बार रीलाइनिंग से इसकी आयु 15 से 20 वर्ष और बढ़ जाती है। भारत में 2030 से पहले लगभग 4.3 करोड़ टन प्रतिवर्ष (एमटीपीए) मौजूदा बीएफ क्षमता की रीलाइनिंग होनी है, जिससे ये भट्टियां अगले 15 से 20 वर्षों तक और चल सकेंगी। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि इन प्रौद्योगिकियों का विस्तार और दीर्घकालिक उपयोग दशकों तक उत्सर्जन को स्थायी बना देगा, जिससे डीकार्बोनाइजेशन लक्ष्यों को झटका लगेगा।
इसका परिणाम यह होगा कि भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़े होते कार्बन सीमा समायोजन, हरित खरीद अनिवार्यता और विश्वसनीय संक्रमण योजनाओं को लेकर निवेशकों के बढ़ते दबाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाएंगी।
रिपोर्ट के अनुसार, इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार की समन्वित कार्रवाई जरूरी होगी। अब तक वैश्विक स्तर पर इस्पात डीकार्बोनाइजेशन में हुए लगभग 24 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 2.25 लाख करोड़ रुपये) के निवेश का बड़ा हिस्सा सार्वजनिक पूंजी के माध्यम से संभव हुआ है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पर्याप्त सरकारी समर्थन के बिना हरित इस्पात की अर्थव्यवस्था अभी व्यावहारिक नहीं है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में उत्पादकों के लिए जोखिम-प्रतिफल संतुलन बदलने और बड़े पैमाने पर निजी निवेश आकर्षित करने के लिए क्रेडिट गारंटी सुविधा, प्रतिस्पर्धी कॉन्ट्रैक्ट्स फॉर डिफरेंस और हरित सार्वजनिक खरीद अनिवार्यता जैसे लक्षित सार्वजनिक वित्तीय साधनों की जरूरत होगी।
आईईईएफए में साउथ एशिया की एनर्जी एनालिस्ट तान्या राणा ने कहा, “कार्रवाई की खिड़की तेजी से संकरी हो रही है। इस्पात क्षेत्र का संक्रमण अंततः कंपनियों द्वारा घोषित लक्ष्यों से नहीं, बल्कि उनके निवेश और निर्मित परिसंपत्तियों से तय होगा। इस पैमाने पर भारत के इस्पात क्षेत्र को अभी लंबा रास्ता तय करना है।”







