New Delhi: दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘प्रतिष्ठित संस्थान’ (IoE) एवं हिंदी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में ‘कोलकाता का हिंदी रंगमंच’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ उत्तरी परिसर के टैगोर हॉल में दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। ‘संकाय शोध कार्यक्रम’ (FRP) के अंतर्गत आयोजित इस संगोष्ठी की शुरुआत वक्ताओं के परिचय एवं उनके औपचारिक स्वागत से हुई। कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा हिंदी विभाग के सहायक आचार्य एवं इस परियोजना के मुख्य सर्वेक्षक डॉ. धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि हिंदी रंगमंच के अखिल भारतीय स्वरूप के निर्माण में गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों, विशेषकर कोलकाता और मुंबई के रंगकर्म की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
कार्यक्रम के बीज वक्ता के तौर पर महेश वशिष्ठ जी अपनी बात रखते हुए अभिनय और रंगमंच की बारिकियों पर केंद्रित रहे। उन्होंने अभिनय की शुरुआत प्रागैतिहासिक काल से मानते हुए कहा कि अभिनय ‘काल्पनिक परिस्थिति में सच्चा व्यवहार’ है। उन्होंने बताया कि एक अभिनेता को अपनी समस्त ऐंद्रियों से सजग होना पड़ता है। उनका मानना था कि दुनिया का कोई भी नाटक बिना अवरोध या द्वंद्व के मुमकिन नहीं हो सकता है। एक अभिनेता के कुछ अपेक्षित गुण होते हैं। मसलन एक अभिनेता को प्रतिक्रियावादी नहीं होना चाहिए, उसे जजमेंटल नहीं होना चाहिए, उसे अनुशासित होना चाहिए और उसे बहुपठित भी होना चाहिए। वाचन करते हुए वाक्य के किस हिस्से पर जोर दिया जाएगा, उससे अर्थ निकलता है।

दूसरे वक्ता के रूप में अदिति महाविद्यालय के हिंदी विभाग की आचार्य प्रो. आशा ने सुचिंतित व्याख्यान दिया। उन्होंने ‘कोलकता हिंदी रंगमंच की महिला रंग-शख्सियत’ विषय पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि कोलकाता हिंदी रंगमंच की दृष्टि से भारत के अन्य शहरों की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध रहा है। उन्होंने कोलकाता में 20वीं शताब्दी के आरंभ से लेकर समकालीन रंगमंच की यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डाला। साथ ही कोलकाता में हिंदी रंगमंच के विकास में अवदान देनी वाली हिंदी रंग-संस्थाओं जैसे – रंग समिति, हिंदी नाट्य परिषद, अनामिका, लिटिल थेस्पिएन इत्यादि के उल्लेखनीय योगदान को रेखांकित किया। प्रतिभा अग्रवाल और उषा गांगुली पर उन्होंने विशेष रूप से बात करते हुए प्रतिभा अग्रवाल के ‘नाट्य शोध संस्थान’ व उषा गांगुली के ‘रंगकर्मी’ नाट्य समूह की चर्चा की। साथ ही उन्होंने उषा गांगुली के निर्देशन-शैली के संदर्भ में कहा कि उनकी कोई एक निश्चित शैली नहीं थी। आखिर में उन्होंने उषा गांगुली को हिंदी और बंगाली नाटकों के बीच सेतु का काम करने वाली महिला के रूप में याद किया।
कोलकाता स्थित ‘लिटिल थेस्पिएन’ रंग-समूह की कर्ताधर्ता उमा झुनझुनवाला ने नाटक एवं रंगमंच के व्यवहारिक पक्ष को केंद्र में रखकर विषय पर बेहद सटीक ढंग से अपनी बात रखी। उन्होंने नए नाटककारों की अस्वीकार्यता की समस्या को उठाते हुए संकेत किया कि आधुनिक नाटक मोहन राकेश पर रुका हुआ है। रंगकर्मियों की समस्याओं की ओर ध्यान दिलाने के बाद उन्होंने रंगमंच को अधिक प्रासंगिक बनाए रखने के लिए अनेक सुझाव दिए। साथ ही रंगमंच के व्यवसायीकरण के महत्व और अखबारों में उनकी समीक्षा को स्थान देने की आवश्यकता पर भी बात की। इसके अतिरिक्त, उन्होंने प्रेम कपूर को कोलकाता में इकलौता थिएटर रिव्युवर कहते हुए अधिक रंग-समीक्षकों की उपस्थिति की ज़रूरत पर बल दिया और कोलकाता हिंदी रंगकर्म के सुनहरे भविष्य की ओर संकेत किया।
दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय संबंध के डीन प्रो. अनिल राय मुख्य अतिथि की भूमिका में थे। उन्होंने सर्वप्रथम हिंदी रंगमंच के ऐतिहासिक महत्त्व पर प्रकाश डाला। इसके साथ गैर हिंदी भाषी रंगमंच ने किस तरह हिंदी रंगमंच पर प्रभाव डाला है, उसकी अपेक्षित चर्चा की। उन्होंने बताया कि रंगमंच पर पहली बार स्त्री पात्रों को स्त्री द्वारा निभाया जाने का श्रेय कोलकाता के रंगमंच को जाता है। भारत में रंगमंच की एक सुदीर्घ परंपरा रही है। वर्तमान में रंगकर्म की स्थिति को सुधारने हेतु समाज तथा विश्वविद्यालयों को मदद करने की अति आवश्यकता पर उन्होंने बल दिया। उन्होंने रंगमंच से जुड़ी पत्रिकाओं को विश्विद्यालयों / महाविद्यालयों के पुस्तकालय में लगाए जाने की आवश्यकता को भी रेखांकित किया, जिससे एक बेहतर समाज का निर्माण किया जा सके ।
हिंदी विभाग की अध्यक्ष एवं वरिष्ठ आचार्य प्रो. सुधा सिंह इस कार्यक्रम में अपना अध्यक्षीय संबोधन प्रस्तुत किया । कलकत्ते का ज़िक्र आते ही प्रो.सुधा सिंह ने कलकत्ता विश्वविद्यालय की अपनी स्मृतियों को याद किया, जिसे वे ‘अहले-वतन’ कहती हैं। उन्होंने कहा कि कलकत्ता के हिंदी लेखकों के सामने ये संकट रहा कि वे बंगाली भाषी लोगों के सामने ख़ुद को कैसे खड़ा करें। उन्होंने हिंदी भाषी जनता के भीतर की ‘संस्कृति विहीनता’को प्रश्नांकित किया। उन्होंने कहा कि आप हिंदी भाषी जनता से प्रेमचंद और निराला के बारे में पूछें तो उन्हें नहीं मालूम होगा, लेकिन पॉपुलर कल्चर की जानकारी उन्हें होगी। उन्होंने सवाल किया कि क्या रंगमंच को बाज़ार के हवाले छोड़ दिया जाय? फिर तो मुकाबला सीधे तौर पर मॉस कल्चर से होगा और ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ के सिद्धांत के चलते पॉप कल्चर ही बचेगा। उन्होंने सवाल किया कि ऐसा क्यों है कि स्त्रियां कम नाटक लिखती हैं? निर्देशन में उनकी भागीदारी क्यों कम दिखलाई पड़ती है? ये कुछ सवाल थे, जो कार्यक्रम ख़त्म होने के साथ हमारे ज़हन में रह गए हैं।
परियोजना में शोध सहायक श्री प्रभाकर सिंह ने अभी तक हुए शोधकार्य की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की और आगामी शोध-योजना पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के अंत में माता सुंदरी कॉलेज के हिंदी विभाग की आचार्य एवं परियोजना की सहायक अन्वेक्षक प्रो. इंदू कुमारी ने सभी वक्ताओं, अतिथियों एवं सभागार में भारी संख्या में मौजूद रहे दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेजों के प्राध्यापकों एवं कार्यक्रम को सफल बनाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण रूप से उपस्थित एवं सक्रिय रहे विद्यार्थियों एवं शोधर्थियों के प्रति भी अपना आभार प्रकट किया।







