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मज़बूत कॉर्पोरेट संक्रमण योजना भारत के डीकार्बोनाइज़ेशन वित्त को खोल सकती है

(Image Courtesy: IEEFA)

IEEFA South Asia: भारत को 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन हासिल करने के लिए कुल 10 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर (₹883 लाख करोड़) के निवेश की आवश्यकता है। ऐसे में पूंजी जुटाने के लिए विश्वसनीय कॉर्पोरेट जलवायु संक्रमण योजना तेज़ी से एक महत्वपूर्ण आवश्यकता बनती जा रही है। हालांकि, इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस (IEEFA) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कॉर्पोरेट परिदृश्य में संक्रमण योजना अब भी बिखरी हुई है और मुख्य रूप से अनुपालन-आधारित दृष्टिकोण से संचालित हो रही है।

बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग (BRSR) ढांचे के भीतर समर्पित संक्रमण योजना प्रकटीकरणों की अनुपस्थिति, तथा वित्तीय प्रासंगिकता और भविष्य उन्मुख मेट्रिक्स पर सीमित मार्गदर्शन के कारण, ऐसे प्रकटीकरण सामने आए हैं जिनकी तुलना करना, सत्यापन करना या निवेश और ऋण निर्णयों के लिए सार्थक रूप से उपयोग करना कठिन है।

IEEFA की रिपोर्ट भारत के कॉर्पोरेट क्षेत्र में संक्रमण योजना की प्रथाओं का विश्लेषण करती है, जिसमें छह उच्च-उत्सर्जन वाले क्षेत्रों—बिजली, इस्पात, सीमेंट, रसायन, कमोडिटीज़ तथा तेल और गैस—में कार्यरत 33 कंपनियों का व्यापक मूल्यांकन शामिल है।

IEEFA के विश्लेषण में भारत के मौजूदा संक्रमण योजना परिदृश्य में तीन प्रणालीगत कमजोरियों की पहचान की गई है। पहली, संक्रमण संबंधी महत्वाकांक्षा अक्सर मात्रात्मक, समयबद्ध और वित्तीय रूप से एकीकृत मार्गों में परिवर्तित नहीं हो पाती, जहां लक्ष्यों, पूंजीगत व्यय (CapEx), राजस्व और जोखिम प्रबंधन के बीच सीमित संबंध दिखाई देता है। दूसरी, शासन संरचनाएं रूप में तो मौजूद हैं, लेकिन सार में कमजोर हैं। और अंततः, प्रकटीकरण खंडित और अतीत-उन्मुख हैं, जिससे पूंजी प्रदाताओं के लिए उनकी उपयोगिता कम हो जाती है।

मूल्यांकन में पाया गया कि जहां अधिकांश कंपनियों ने नेट-ज़ीरो या उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य घोषित किए हैं, वहीं बहुत कम कंपनियां यह स्पष्ट करती हैं कि इन लक्ष्यों को हासिल कैसे किया जाएगा। दक्षिण एशिया में सतत वित्त और जलवायु जोखिम के रिसर्च लीड शंतनु श्रीवास्तव के अनुसार, “केवल कुछ ही कंपनियां अपने लक्ष्यों को पूंजीगत व्यय योजनाओं, राजस्व अनुमानों या व्यापार रणनीति में बदलाव से जोड़ती हैं, जिससे निवेशकों और ऋणदाताओं के लिए संक्रमण मार्गों की व्यवहार्यता का आकलन करना कठिन हो जाता है।”

वित्तीय प्रकटीकरण भी एक बड़ी कमी बने हुए हैं। कंपनियां शायद ही कभी जलवायु से जुड़े जोखिमों और अवसरों के संभावित वित्तीय प्रभावों को मात्रात्मक रूप से दर्शाती हैं। जहां परिदृश्य विश्लेषण का प्रकटीकरण किया भी गया है, वह प्रायः गुणात्मक होता है और उसमें मान्यताओं, समय-सीमा या वित्तीय प्रभावों को लेकर पारदर्शिता का अभाव रहता है।

शासन संबंधी प्रकटीकरण भी संक्रमण योजना की प्रभावशीलता को और कमजोर करते हैं। IEEFA – दक्षिण एशिया की ऊर्जा विश्लेषक और रिपोर्ट की सह-लेखिका तान्या राणा कहती हैं, “हालांकि अधिकांश कंपनियां सततता से जुड़े मुद्दों पर बोर्ड या प्रबंधन स्तर की निगरानी की जानकारी देती हैं, लेकिन बहुत कम कंपनियां स्पष्ट जवाबदेही, निर्णय लेने के अधिकार या संक्रमण परिणामों से जुड़े प्रोत्साहन ढांचे के प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।”

समग्र रूप से, क्षेत्रवार समीक्षा से भारत के प्रमुख उत्सर्जनकारी उद्योगों में संक्रमण योजना के प्रकटीकरण की परिपक्वता के स्तर में काफ़ी भिन्नता सामने आती है। एक स्पष्ट पैटर्न यह उभरता है कि कुछ बड़ी, सूचीबद्ध या वैश्विक स्तर पर सक्रिय कंपनियां अपेक्षाकृत उन्नत प्रथाएं प्रदर्शित करती हैं, जबकि अधिकांश कंपनियां अब भी संक्रमण योजना के शुरुआती चरण में हैं।

श्रीवास्तव के अनुसार, “प्रकटीकरण उच्च-स्तरीय महत्वाकांक्षी बयानों के मामले में सबसे मज़बूत हैं, जबकि उपाय-स्तरीय मात्रात्मकता, वित्तीय एकीकरण और स्कोप 3 कवरेज के मामले में सबसे कमज़ोर।” शासन संरचनाएं अक्सर मौजूद होती हैं, लेकिन संचालन स्तर पर समावेशन, क्षमता निर्माण और जलवायु-आधारित पारिश्रमिक अब भी सीमित हैं। कार्यबल और समुदाय संक्रमण पर सहभागिता को अब भी ‘जस्ट ट्रांज़िशन’ के बजाय कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के रूप में देखा जाता है, और बाहरी आश्वासन की प्रथाएं कंपनी के आकार के अनुसार व्यापक रूप से भिन्न होती हैं।

रिपोर्ट में भारत में कॉर्पोरेट संक्रमण योजना को सशक्त करने और प्रकटीकरण की निर्णय-उपयोगिता में सुधार के लिए लक्षित सिफ़ारिशों का एक सेट प्रस्तुत किया गया है।

कॉर्पोरेट स्तर पर, रिपोर्ट सिफ़ारिश करती है कि कंपनियां केवल उच्च महत्वाकांक्षी बयानों से आगे बढ़ें और ऐसी संक्रमण योजनाएं विकसित करें जो उत्सर्जन लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से पूंजीगत व्यय, परिचालन परिवर्तनों, वित्तीय आवश्यकताओं और जोखिम प्रबंधन प्रक्रियाओं से जोड़ें। इसमें परिदृश्य विश्लेषण के बेहतर उपयोग, आंतरिक डेटा प्रणालियों को मज़बूत करने और संक्रमण योजना को मुख्य व्यवसाय रणनीति में अंतर्निहित करने की आवश्यकता शामिल है।

नियामकों के लिए, रिपोर्ट सिफ़ारिश करती है कि सेबी (SEBI) BRSR ढांचे के भीतर संक्रमण योजना से जुड़ी अपेक्षाओं को स्पष्ट रूप से एकीकृत करे, जिसमें भविष्य उन्मुख मेट्रिक्स, वित्तीय प्रासंगिकता और जलवायु लक्ष्यों तथा व्यापार रणनीति के बीच संबंध पर स्पष्ट मार्गदर्शन शामिल हो।

राणा के अनुसार, “कॉर्पोरेट संक्रमण योजना और प्रकटीकरण प्रथाओं को मज़बूत करने के लिए नियामकों और कंपनियों द्वारा समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता होगी।” भारतीय कंपनियों को आंतरिक क्षमता निर्माण, परिदृश्य विश्लेषण, डेटा प्रणालियों और शासन संरचनाओं में निवेश करना चाहिए।

नियामकीय समन्वय भी अहम होगा। भारतीय रिज़र्व बैंक के प्रस्तावित जलवायु जोखिम प्रकटीकरण ढांचे, क्षेत्रवार डीकार्बोनाइज़ेशन रोडमैप्स तथा ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम के साथ तालमेल से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि कॉर्पोरेट संक्रमण योजना भारत के निम्न-कार्बन परिवर्तन को आगे बढ़ाने वाले एकीकृत इकोसिस्टम का हिस्सा बने।

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