New Delhi: सूरजपुर के ऐतिहासिक बाराही मेला–2026 में साहित्य, संस्कृति और लोकपरंपरा का अनुपम समागम साकार हुआ, किंतु इस भव्य आयोजन का सर्वाधिक तेजस्वी एवं हृदयस्पर्शी आयाम सुप्रसिद्ध कवि एवं साहित्यकार भगवत प्रसाद शर्मा की राष्ट्रोन्मुख काव्यधारा रही। उनकी ओजस्वी वाणी ने समूचे वातावरण को देशभक्ति के दिव्य आलोक से आलोकित कर दिया।
सायंकालीन काव्य-संध्या में जब भगवत प्रसाद शर्मा ने अपने सशक्त कंठ से वीर शहीदों के प्रति श्रद्धा-सुमन अर्पित किए, तब उपस्थित जनसमूह भावविभोर होकर राष्ट्रप्रेम के भाव में निमग्न हो उठा। उनकी कविता की पंक्तियाँ—
“मस्तक तिलक लगाऊँ अपने माटी हिन्दुस्तान की,
पुण्य धरा ये पावन भूमि वीरों के बलिदान की…”
ने जनमानस में अदम्य देशभक्ति का संचार किया तथा श्रोताओं को आत्मगौरव एवं कर्तव्यबोध का स्मरण कराया।
भगवत प्रसाद शर्मा का काव्य केवल शब्दों का संयोजन नहीं, अपितु वह राष्ट्रात्मा की अभिव्यक्ति है—एक ऐसी भावधारा, जो हृदय को उद्वेलित कर चेतना को जागृत करती है। उनके काव्य में ओज, संवेदना और सांस्कृतिक चेतना का अद्वितीय संगम दृष्टिगोचर होता है। वे उन विरल कवियों में हैं, जिनकी वाणी में जनमानस को आंदोलित करने की क्षमता निहित होती है।
उनकी प्रस्तुति ने यह सिद्ध कर दिया कि सशक्त काव्य समाज में नवचेतना का संचार कर सकता है और राष्ट्रप्रेम की ज्योति को प्रज्वलित रख सकता है। उनकी काव्याभिव्यक्ति में जहाँ एक ओर वीर रस की प्रखरता है, वहीं दूसरी ओर मातृभूमि के प्रति अटूट श्रद्धा और समर्पण का पावन भाव भी विद्यमान है।
विशेष टिप्पणी:
भगवत प्रसाद शर्मा समकालीन हिन्दी काव्य-जगत के ऐसे सशक्त स्तंभ हैं, जिनकी लेखनी राष्ट्रभाव की संवाहक एवं जनचेतना की प्रेरक है। उनकी कविताएँ केवल श्रवण का विषय नहीं, बल्कि आत्मा के स्पंदन को स्पर्श करने वाली अनुभूति हैं। वे शब्दों के शिल्पी ही नहीं, अपितु भावों के साधक भी हैं, जिनकी रचनाएँ युगधर्म का सजीव प्रतिबिंब प्रस्तुत करती हैं।
बाराही मेला–2026 में उनकी गरिमामयी उपस्थिति एवं काव्य-पाठ ने इस आयोजन को एक नई ऊँचाई प्रदान की और इसे दीर्घकाल तक स्मरणीय बना दिया।







