नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक तापमान में वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार करने की ओर बढ़ रही है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए अनुकूलन वित्तपोषण जरूरतों से काफी कम है, संस्थागत बाधाओं के कारण योजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावित हो रहा है और नुकसान एवं क्षति लगातार बढ़ रही है।
UNEP की 2026 की अनुकूलन अंतराल रिपोर्ट: तैयार? नहीं (Adaptation Gap Report: Ready? Not) में कहा गया है कि जोखिमों को कम करने, लचीलापन मजबूत करने और अधिक समावेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए अनुकूलन संबंधी प्रयासों का विस्तार करना, उन्हें प्रभावी बनाना और पर्याप्त वित्तपोषण उपलब्ध कराना बेहद जरूरी होगा। हालांकि, विकसित देशों से विकासशील देशों को मिलने वाला अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक अनुकूलन वित्त उनकी अनुमानित जरूरतों से काफी कम है। वर्ष 2035 तक यह जरूरत सालाना 305 अरब अमेरिकी डॉलर आंकी गई है। COP30 में वर्ष 2035 तक विकासशील देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक वित्त प्रवाह को तीन गुना करने की आकांक्षा पूरी होने पर भी जलवायु प्रभावों से निपटने के लिए उनकी जरूरतों का केवल 20-29 प्रतिशत ही पूरा हो सकेगा।
UNEP की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने कहा, “दुनिया मौजूदा जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने के लिए भी तैयार नहीं है, ऐसे में 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार होने के परिणामों के लिए तैयार होने की बात तो दूर है। तुर्किये में होने वाले जलवायु COP31 और उसके बाद भी देशों को वर्ष 2035 तक अनुकूलन वित्तपोषण को तीन गुना करने के COP30 के ग्लोबल मुटिराओ लक्ष्य को हासिल करने के प्रयास तेज करने होंगे। साथ ही यह समझना होगा कि लोगों की जान बचाने, नुकसान एवं क्षति को रोकने और अर्थव्यवस्थाओं की रक्षा के लिए इससे भी अधिक वित्त की आवश्यकता होगी।”
वित्तपोषण की स्थिति
विकसित देशों से विकासशील देशों को मिलने वाला अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक अनुकूलन वित्त वर्ष 2024 में 28.2-31.7 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 1 अरब डॉलर अधिक है। सबसे कम विकसित देशों (LDCs) और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों (SIDS) को मिलने वाला वित्त वर्ष 2019 से 2024 के बीच वास्तविक रूप में बढ़ा, लेकिन वर्ष 2022 के उच्चतम स्तर के बाद इसमें गिरावट आई है, जबकि इसमें वृद्धि होनी चाहिए थी।
राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs), राष्ट्रीय अनुकूलन योजनाओं (NAPs) और मॉडल आधारित अनुमानों के आकलन के आधार पर रिपोर्ट में वर्ष 2035 तक विकासशील देशों की अनुकूलन संबंधी जरूरतों का केंद्रीय अनुमान सालाना लगभग 305 अरब अमेरिकी डॉलर लगाया गया है। इसमें निजी क्षेत्र की अपनी जरूरतों को काफी हद तक शामिल नहीं किया गया है, जिन्हें जोड़ने पर यह आंकड़ा लगभग दोगुना हो सकता है।
COP30 में ग्लोबल मुटिराओ निर्णय के तहत वर्ष 2035 तक अनुकूलन वित्तपोषण को कम से कम तीन गुना करने के प्रयासों का आह्वान किया गया था। यह वृद्धि मौजूदा वित्त प्रवाह या ग्लासगो क्लाइमेट पैक्ट के आधार पर तय होने के अनुसार, वर्ष 2035 तक अंतरराष्ट्रीय अनुकूलन वित्त को बढ़ाकर सालाना 85-120 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचा सकती है।
मुद्रास्फीति के प्रभाव को समायोजित करने के बाद वित्तपोषण में तीन गुना वृद्धि भी वर्ष 2035 में अनुकूलन वित्त की जरूरतों का केवल 20-29 प्रतिशत ही पूरा कर पाएगी। हालांकि, सबसे कम विकसित देशों और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों के लिए वित्त प्रवाह को तीन गुना करने से उनकी 49-83 प्रतिशत जरूरतें पूरी हो सकती हैं।
सकारात्मक रुझान
रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक रुझानों का भी उल्लेख किया गया है।
हालांकि, वित्तपोषण में वृद्धि की मौजूदा गति वर्ष 2019 के स्तर से वित्त को दोगुना कर 2025 तक 40 अरब अमेरिकी डॉलर करने के ग्लासगो क्लाइमेट पैक्ट के लक्ष्य को हासिल करने के लिए जरूरी गति से काफी कम है, फिर भी इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। बहुपक्षीय विकास बैंकों (MDBs) ने वर्ष 2025 में अपने वित्तपोषण में उल्लेखनीय वृद्धि की होगी। हालांकि, इस लक्ष्य की प्राप्ति इस बात पर निर्भर करेगी कि द्विपक्षीय विकास भागीदारों से मिलने वाला अनुकूलन वित्त आधिकारिक विकास सहायता (ODA) में गिरावट से प्रभावित होता है या नहीं।
विकासशील देशों के बीच वित्तीय प्रवाह भी बढ़ रहा है। बहुपक्षीय विकास बैंकों और प्रत्यक्ष दक्षिण-दक्षिण सहयोग के माध्यम से मिलने वाला योगदान वर्ष 2019 के 3.8 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2024 में 9.6 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया।
इस बीच, निजी क्षेत्र से मिलने वाला वित्त भी बढ़ रहा है। हालांकि, इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से निजी क्षेत्र की अपनी अनुकूलन जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जा रहा है या इसका भुगतान स्वयं विकासशील देशों द्वारा किए जाने की संभावना है। इससे अधिक सार्वजनिक हित वाले अनुकूलन कार्यों के वित्तपोषण अंतर को केवल 15-20 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।
हालांकि, केवल वित्तपोषण ही पर्याप्त नहीं है। प्रगति कई संस्थागत कारकों पर भी निर्भर करती है, जो अनुकूलन संबंधी प्राथमिकताओं को वास्तविक उपायों में बदलने में मदद करते हैं। सरकारें इन कारकों को मजबूत करने के लिए पहले से ही कदम उठा रही हैं। इनमें जलवायु परिवर्तन से संबंधित रूपरेखा कानूनों को अपनाना, नीतिगत अनुभवों से सीखने के लिए मंच तैयार करना, विभिन्न क्षेत्रों और सरकारी स्तरों के बीच समन्वय में सुधार करना तथा जलवायु वित्त जुटाने और उसका प्रबंधन करने के लिए विशेष तंत्र स्थापित करना शामिल है।
नुकसान और क्षति में लगातार वृद्धि
जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और उनके अनुकूल खुद को ढालने के लिए मजबूत प्रयासों की कमी के कारण जलवायु संबंधी नुकसान और क्षति बढ़ रही है। यह नुकसान अनुकूलन संबंधी कदम उठाए जाने के बावजूद भी हो सकता है। रिपोर्ट में पाया गया है कि नुकसान और क्षति से निपटने के लिए उपलब्ध वित्तपोषण, पहचानी गई जरूरतों से कम है। वहीं, जटिल प्रक्रियाओं और सीमित क्षमता के कारण सहायता प्राप्त करना मुश्किल हो रहा है।
उदाहरण के लिए, नुकसान और क्षति से निपटने के लिए बनाए गए कोष (Fund for responding to Loss and Damage) के पहले चरण में 2.8 अरब अमेरिकी डॉलर की सहायता की मांग सामने आई, जबकि इसके लिए शुरुआती वित्तपोषण केवल 342 मिलियन अमेरिकी डॉलर था। यह मांग और उपलब्ध वित्त के बीच बड़े अंतर को दर्शाता है। हालांकि, वैश्विक स्तर पर नुकसान और क्षति से निपटने के लिए वित्तपोषण की वास्तविक कमी का अभी तक पता नहीं चल पाया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि नुकसान और क्षति का आकलन करने की क्षमता मजबूत करने, पर्याप्त एवं अनुमानित वित्तीय और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने, सहायता प्राप्त करने की प्रक्रियाओं को सरल बनाने तथा प्रभावित समुदायों को इससे निपटने के उपाय तय करने में सार्थक भागीदारी देने की स्पष्ट आवश्यकता है।







