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सरकारी योजनाओं के मायाजाल में फंसता भारतीय लोकतंत्र

Gorakhpur (Anurag Upadhyay): भारत गणतंत्र में प्रश्न करना बहुत ही सामान्य बात है,परन्तु जब प्रश्न भारत सरकार से करना होता तब स्वतंत्र रूप से यक्ष प्रश्न करने से कहीं ज्यादा  छद्मावरण तैयार कर जनता से प्रश्न करना आसान हो गया है। सोशल मीडिया में प्रश्न कर जनता को ध्रुवीकरण करना एक सहज प्रक्रिया बन गयी है जिसका जीवंत उदाहरण

आजकल एक बिहार चुनाव के बाद वोट चोरी का मुद्दा बहुत तेजी से जनता के बीच में विपक्ष द्वारा प्रसारित किया गया।

भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) का उपयोग करके चुनाव कराने का मानक तरीका इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग है। इस प्रणाली को भारतीय चुनाव आयोग के लिए सरकारी स्वामित्व वाली इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स द्वारा विकसित किया गया था । 1990 के दशक के उत्तरार्ध से, इन्हें चरणबद्ध तरीके से भारतीय चुनावों में लागू किया गया।

ईवीएम स्वतंत्र मशीनें हैं जो  पूरी तरह से स्वचालित, बैटरी से चलने वाली मशीनें हैं और इन्हें किसी नेटवर्क की आवश्यकता नहीं होती है। इनमें इंटरनेट से जुड़ने वाले कोई वायरलेस या वायर्ड घटक नहीं होते हैं।

सत्ताधारी सरकार को हराने में असफल रहने के बाद विभिन्न विपक्षी दलों ने समय-समय पर दोषपूर्ण ईवीएम का आरोप लगाया है। 2013 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को ईवीएम के विश्वसनीय संचालन की पुष्टि के लिए पेपर ट्रेल शामिल करने का निर्देश दिया। चुनाव आयोग ने मतदाता-सत्यापित पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) वाली ईवीएम विकसित कीं, जिनका परीक्षण 2014 के भारतीय आम चुनाव में किया गया था । सर्वोच्च न्यायालय के 2019 के फैसले के बाद, सभी चुनावों में वीवीपीएटी से लैस ईवीएम का उपयोग किया जाता है, जिसमें अंतिम परिणाम प्रमाणित करने से पहले विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए केवल 2% वीवीपीएटी का सत्यापन किया जाता है।

2004 में, आम चुनाव में, पहली बार सभी 543 संसदीय क्षेत्रों में EVM का इस्तेमाल किया गया था। तब से, सभी राज्य विधानसभा और संसदीय चुनाव EVM का इस्तेमाल करके ही होते हैं।

लोकसभा चुनाव (2004 से 2026 तक)

2004 लोकसभा चुनाव:

विजेता: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के नेतृत्व वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA)।

प्रधानमंत्री: मनमोहन सिंह।

2009 लोकसभा चुनाव:

विजेता: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) (UPA गठबंधन)।

प्रधानमंत्री: मनमोहन सिंह।

2014 लोकसभा चुनाव:

विजेता: भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA)।

प्रधानमंत्री: नरेंद्र मोदी।

2019 लोकसभा चुनाव:

विजेता: भारतीय जनता पार्टी (BJP) (NDA गठबंधन)।

प्रधानमंत्री: नरेंद्र मोदी।

2024 लोकसभा चुनाव:

विजेता: भारतीय जनता पार्टी (BJP) (NDA गठबंधन)।

प्रधानमंत्री: नरेंद्र मोदी।

उपरोक्त चुनावी आंकड़ों को देखकर लगता है कि जनता का मत जिसको मिला वो चुनाव जीत गया बीजेपी हो या कांग्रेस हो।

हम तथ्यों को अपने समझ और बुद्धि पर कसने की कोशिश कर तो पता चलता है कि क्या सभी ईवीएम को हैक नहीं किया जा सकता है।

१. माना किसी राज्य में 412 सीटों पर चुनाव हुआ

और ईवीएम हैकर कोई एक नंबर चुन लिया गया कि जो भी वोट जाएगा वह पहले नंबर पर ही जाएगा परंतु यह बात इतनी तथ्य परक नहीं लगती है की सारी जगह पर चुनाव आयोग बीजेपी के प्रत्याशियों को कि पहले नंबर पर रखें । इससे यह लगता है कि किसी एक नंबर को हैक करने से सरकार वोट चोरी नहीं कर सकती है।

२. यदि दूसरी बात देखी जाए तो सरकार हैकिंग के लिए सरकार हर बूथ या हर विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से अगर ईवीएम हैक करना चाहे तो उसे एक लंबा समय का लगेगा । वहीं अलग-अलग राज्यों के चुनाव और संसदीय चुनाव में ईवीएम का प्रयोग होने से हमें यह पता चलता है कि सरकार के पास इतना समय नहीं है कि वह ईवीएम को प्रत्याशियों के नामांकन और उनके नाम के हिसाब से हैक करें और इसमें अनिश्चितता १००% की है क्योंकि पता नहीं विपक्ष किस जगह पर और किसे टिकट देगा।

उपरोक्त दोनों तथ्यों को अपनी समझ के हिसाब से सोचने और विचारने पर लगता है कि यह बातें सही है कि ईवीएम हैक करके वोट चोरी नहीं किया जा सकता लेकिन फिर भी एक चीज ध्यान देने वाली है जो लगातार हर चुनाव में हो रही है या यू कहे की बीजेपी इस फार्मूले को हर चुनाव के पहले या जिन राज्यों में चुनाव होना है उन राज्यों में चुनाव की घोषणा के पहले यह दांव खेलना शुरू कर देती है । नई-नई योजनाओं के द्वारा जनता को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचाना।

आप देखेंगे कि गरीबी को मिटाने के लिए दो तरह से कोशिश की जाती है ,एक प्रत्यक्ष कोशिश और दूसरी अप्रत्यक्ष कोशिश ।

प्रत्यक्ष कोशिश में हम जनता को आत्मनिर्भर बनाने की तरफ प्रयास करते हैं, जिससे जनता आत्मनिर्भर बने और खुद ही अपनी मेहनत से आय सृजन कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करें साथ  ही साथ अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करें।  वहीं दूसरी तरफ जब हम अप्रत्यक्ष रूप से गरीबों को मिटाने की कोशिश करते हैं तो हम भारत के एक बहुत बड़े अमीर तपके और मध्यम वर्ग के द्वारा दिए गए टैक्स के पैसों को सुनियोजित तरीके से सरकारी योजनाओं के अंतर्गत गरीब लोगों के बीच में वितरित कर देते हैं । इन योजनाओं के लाभ के द्वारा उनकी गरीबी को कुछ समय के लिए और कुछ हद तक मिटाया जा सकता है परंतु यह लंबे समय तक उन्हें लाभान्वित नहीं कर सकता। सरकार कहीं न कहीं इस अप्रत्यक्ष प्रणाली का प्रयोग करके हर चुनाव के एक-दो साल पहले या चुनाव की घोषणा के लगभग 1 साल के अंतर में ऐसी योजनाएं चलाती है , जिससे गरीब वर्ग को लाभ पहुंचे या यूं कहें कि कहीं ना कहीं सरकार योजनाओं को चलाने के बाद उन्हें अनवरत रूप से चुनाव के बीच में भी चलती रहती है । जिसका प्रभाव सीधे चुनाव में होने वाले मतदान पर पड़ता है भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता इन योजनाओं को बहुत ही अच्छी तरीके से लोगों को बताते हैं और उनके लाभों को डायरेक्ट दिखाते हैं जब इस प्रकार का लाभ चुनाव के समय में आपको सोने पर सुहागा के तौर पर दिख रहा हो तो आप किसी और पार्टी को क्यों चुनेंगे ।

खास तौर पर बिहार के हुए चुनाव से यह स्पष्ट हो जाता है कि चुनाव के दौरान भी लोगों को योजनाओं के तहत लगातार सरकार लाभान्वित करती रही , जिससे कहीं ना कहीं चुनाव के परिणाम प्रभावित हुए हैं यह तार्किक और बौद्धिक रूप से मानने वाली बात है । सरकार इसे माने या ना माने आगामी चुनाव में इस तरह के अप्रत्यक्ष रूप से गरीबी मिटाने वाले टूल्स का प्रयोग करके सरकार और भी वोट पा सकती है और बना भी सकती है ।

आप देखेंगे कि विगत 25 वर्षों में कांग्रेस की गवर्नमेंट हो या बीजेपी की गवर्नमेंट हो दोनों सरकारों ने इस तरह की सरकारी योजनाओं का प्रयोग किया है कहीं ना कहीं इस तरह की योजनाओं से चुनाव तो प्रभावित होता ही है साथ ही साथ भारतीय राजस्व को भी नुकसान पहुंचता है यह वोट चोरी हो या वोट चोरी ना हो परंतु यह जनता जनता के द्वारा जनता के लिए चुने गए नेतृत्वकर्ताओं के विश्वास पर चोट तो है ही।

साथ ही साथ भारतीय टैक्स के पैसों का चुनाव में वोट इंफ्लूएंसर के तौर पर प्रयोग तो है ही, चुनाव आयोग क्यों मौन है ? या वो इस प्रयोग को बढ़ावा देने में नेपथ्य की भूमिका में तो नहीं। ये सब यक्ष प्रश्न भारत सरकार और हम नौजवानों के बीच में आज सास्वत बने हैं।

(लेखक का अपना विचार और विश्लेषण-अनुराग उपाध्याय गोरखपुर में भौतिक विज्ञान के शिक्षक हैं। साथ ही भारतीय सामाजिक, राजनीतिक और पर्यावरणीय मुद्दों के स्वतंत्र टिप्पणीकार भी हैं।)

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