मुंबई: भारत के प्रमुख निवेश बैंक Avendus Capital ने घरेलू पैकेजिंग उद्योग पर अपनी नवीनतम रिपोर्ट जारी की है, जिसमें इस क्षेत्र को देश की खपत-आधारित वृद्धि का प्रमुख लाभार्थी बताया गया है। रिपोर्ट में विभिन्न सेगमेंट्स में बढ़ती निवेशकों की रुचि और डील गतिविधियों को भी रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय पैकेजिंग उद्योग अगले पांच वर्षों में लगभग 9% CAGR से बढ़कर FY30 तक 92 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत अब दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ने वाला पैकेजिंग बाजार बन गया है, जो GDP वृद्धि दर से 1.3 गुना अधिक गति से बढ़ने का अनुमान है। इस वृद्धि को खाद्य एवं पेय, फार्मास्यूटिकल्स, पर्सनल केयर, कृषि, टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुएं (ड्यूरेबल्स) और ई-कॉमर्स जैसे अंतिम उपयोग वाले क्षेत्रों से बढ़ती मांग, संगठित रिटेल और क्विक कॉमर्स के बढ़ते विस्तार से बल मिल रहा है। वैश्विक स्तर पर पैकेजिंग उद्योग पहले ही 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का हो चुका है, जो कागज एवं बोर्ड, प्लास्टिक, धातु, कांच और कंपोजिट जैसे क्षेत्रों में सबसे बड़े विनिर्माण इकोसिस्टम्स में से एक है। भारत में प्रति व्यक्ति प्लास्टिक पैकेजिंग खपत विकसित देशों की तुलना में अभी भी काफी कम है—अमेरिका में यह लगभग 7 गुना और यूरोप में करीब 4 गुना अधिक है—जो भविष्य में वृद्धि की बड़ी संभावनाओं का संकेत देता है।
विभिन्न सामग्री (सब्सट्रेट्स) में, रigid प्लास्टिक पैकेजिंग (RPP) भारत में सबसे तेजी से बढ़ने वाला सेगमेंट बनकर उभर रहा है, जो अगले पांच वर्षों में 10.3% CAGR से बढ़ने की संभावना है। इसकी मजबूती, लागत प्रभावशीलता और बड़े पैमाने पर वितरण के लिए उपयुक्तता इसके प्रमुख कारण हैं। वहीं, फ्लेक्सिबल प्लास्टिक पैकेजिंग (FPP) सबसे बड़ा सेगमेंट बना हुआ है, जो भारतीय पैकेजिंग बाजार का 27% हिस्सा है और पैकेज्ड फूड, FMCG, पर्सनल केयर और फार्मा सेक्टर से मजबूत मांग के चलते समर्थित है। प्लास्टिक के अलावा, कागज आधारित पैकेजिंग में भी वृद्धि देखने को मिल रही है, जो रिसायक्लेबल और फाइबर-आधारित सामग्रियों की ओर बढ़ते रुझान से लाभान्वित हो रही है, जबकि कांच और धातु पैकेजिंग क्रमशः 7.5% और 7% CAGR से बढ़ने की उम्मीद है।
Avendus Capital के इंडस्ट्रियल्स इन्वेस्टमेंट बैंकिंग के मैनेजिंग डायरेक्टर एवं प्रमुख, कौशिक भट्टाचार्य ने कहा, “पैकेजिंग उद्योग भारत की खपत वृद्धि का एक मजबूत संकेतक बनकर उभरा है। अब यह केवल एक कार्यात्मक इनपुट नहीं रह गया है, बल्कि ब्रांडिंग और ग्राहक अनुभव के माध्यम से उच्च मूल्य का अंतर पैदा करने के लिए उपयोग किया जा रहा है। बढ़ती आय, प्रीमियमाइजेशन और रिटेल व सप्लाई चेन के औपचारिककरण के साथ, भारतीय पैकेजिंग उद्योग संगठित और ब्रांडेड खपत की ओर हो रहे व्यापक बदलाव को पूरा करने के लिए संरचनात्मक रूप से मजबूत स्थिति में है। हमें विश्वास है कि ये संरचनात्मक कारक आगे भी डील गतिविधियों, समेकन (कंसोलिडेशन) और क्षमताओं के विस्तार को बढ़ावा देते रहेंगे, जिससे यह क्षेत्र रणनीतिक और वित्तीय निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहेगा।”
रिपोर्ट में स्थिरता (सस्टेनेबिलिटी) को भी एक प्रमुख संरचनात्मक विषय बताया गया है। हालांकि फ्लेक्सिबल पैकेजिंग प्रति यूनिट कम सामग्री उपयोग के कारण महत्वपूर्ण बनी हुई है, लेकिन भारत में रीसाइक्लिंग दर अभी भी 10% से कम है, जो एक बड़ी कमी को दर्शाता है। विस्तारित उत्पादक जिम्मेदारी (EPR) जैसे नियामकीय प्रावधानों से रिसायक्लेबल और पर्यावरण-अनुकूल सामग्रियों को अपनाने की प्रक्रिया तेज हो रही है। इसके परिणामस्वरूप, भारतीय उपभोक्ता कंपनियां मल्टी-लेयर लैमिनेट्स से हटकर मोनो-मटेरियल और रिसायक्लेबल संरचनाओं की ओर बढ़ रही हैं।
भारत में, पिछले दशक में डील गतिविधियां स्थिर बनी रही हैं, जिसमें प्राइवेट इक्विटी और रणनीतिक निवेशकों की भागीदारी बढ़ी है। वित्तीय निवेशकों ने 76% अल्पांश (माइनॉरिटी) लेनदेन और 25% बहुमत (मेजॉरिटी) लेनदेन में योगदान दिया है, जो इस क्षेत्र की दीर्घकालिक विकास क्षमता में निवेशकों के बढ़ते विश्वास को दर्शाता है। जैसे-जैसे उद्योग विकसित हो रहा है, विलय एवं अधिग्रहण (M&A) उद्योग के विस्तार, क्षमताओं के विकास और उच्च-विकास वाले सेगमेंट्स व भौगोलिक क्षेत्रों में प्रवेश के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।







